अस्कोट राजवंश के समय में मेले का दीदार करने वाले 90 साल के बुजुर्ग बहादुर सिंह पाल बताते हैं कि मेले के दौरान पाल राजा काली-गोरी नदी पर लकड़ी के अस्थायी पुल बनवाते थे। जर्मनी से मंगाए गए मिट्टी तेल से जलने वाले गैस से प्रकाश की व्यवस्था होती थी। अल्मोड़ा के जोगा लाल साह की मेले में लगने वाली दुकान से मिठाई खरीदने वालों की भीड़ रहती थी। ऐतिहासिक मेले में एक आने में बहुत सामान मिल जाता था। संवाद
पशु, कृषि संबंधित सामान की लगती थी प्रदर्शनी
जौलजीबी मेला वृहद स्तर पर फैला था। 1871 में पशु और कृषि यंत्रों की प्रदर्शनी लगती थी। जौलजीबी मेला जोग्यूड़ा, बगड़ीहाट, तीतरी आदि क्षेत्रों में लगता था। तब मेला डेढ़ माह तक चलता था। गाय, भैंस, बकरियों की मेले में अधिक खरीदारी होती थी। घोड़े, खच्चर मेले में बिक्री के लिए बहुत कम आते थे। मेले में दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले लोगों के रहने खाने की व्यवस्था पाल राजवंश के लोग ही करते थे।
तिब्बत का नमक था प्रसिद्ध
जौलजीबी मेले में तिब्बत के नमक की अधिक मांग थी। तिब्बती लोग गेहूं, चावल, मडुवा और जौ के बदले सामान देते थे। नेपाल का घी और शहद मालू के पत्तों के डोनों में बिक्री के लिए आता था। इसके साथ ही नेपाल का गुड़ लोगों की पहली पसंद होता था। लोग सालभर के लिए गुड़ खरीदते थे। मेले में तिब्बत, मथुरा, लोहाघाट, चंपावत, अल्मोड़ा, बागेश्वर से व्यापारी आते थे। तिब्बती अपने साथ नमक, सुहागा, ऊनी वस्त्र लेकर आते थे। रोशनी के लिए चर्बी के दीये जलाए जाते थे।
मार्गशीर्ष में लगता था धार्मिक मेला
जौलजीबी मेला 104 साल तक मार्गशीर्ष संक्रांति पर होता था। उस समय संक्रांति पर मेले में गंगा स्नान का बड़ा महत्व था। ऐतिहासिक जौलीजीबी मेले में क्षेत्रवासी कलशयात्रा निकालकर 149 साल पुरानी परंपरा को बनाए रखना चाहते हैं। 104 वर्ष तक मेले को धार्मिक रूप से मनाया जाता था। यहां आने वाले लोग काली गोरी नदी के संगम में स्नान, ज्वालेश्वर मंदिर में दर्शन और पूजन के बाद ही मेले में शिरकत करते थे।
मेला न होने से लोगों में मायूसी
जौलजीबी मेला न होने के कारण क्षेत्रवासियों में मायूसी है। उनका कहना है कि सरकार कई आयोजनों की अनुमति दे रही है। ऐसे में मेले का संचालन भी कोविड नियमों के तहत किया जाना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता लीला बंग्याल ने कहा कि मेले की परंपरा बनाए रखने के लिए प्रशासन को कलशयात्रा निकालने की अनुमति देनी चाहिए। कोरोना गाइडलाइन तहत कलशयात्रा निकाली जाएगी।
जौलजीबी मेला मेरे पूर्वजों ने शुरू किया था, जो लगातार बिना किसी रुकावट के स्थानीय लोगों की मदद से लगाया जाता था। ऐसे में स्थानीय लोगों के अनुरोध पर मेले की परंपरा को बनाए रखने के लिए कलशयात्रा निकाली जानी चाहिए। इसमें प्रशासन को सहयोग करना चाहिए। कोरोना काल में लोगों की सुरक्षा भी जरूरी है, लेकिन परंपरा भी जरूरी है।
- युवराज कुंवर महिराज सिंह पाल, देवल दरबार अस्कोट।
कोरोना के कारण ऐतिहासिक जौलजीबी मेले का आयोजन इस बार नहीं किया जा रहा है।
- एके शुक्ला, एसडीएम।