गंगोलीहाट के जान्हवी नौले के गंदगी से बचाने के लिए इस तरह बंद किया गया
- फोटो : अमर उजाला
गर्मियों के साथ ही पहाड़ों में जहां लोगों को पानी की समस्या से जूझना पड़ रहा है। वहीं ऐसे में प्रकृति की देन ही कही जाएगी कि 13वीं शताब्दी में कत्यूरी शासकों द्वारा बनाए गए गंगोलीहाट के जाह्नवी नौले की अविरल धारा आज भी पुरातन समय की तरह ही बह रही है और लोगों की जरूरत को पूरा कर रही है। सदाबहार जाह्नवी नौले का पानी आज भी लोगों की पहली पसंद है। नौले के जल को गंगा जल के समान माना जाता है।
13वीं शताब्दी में कत्यूरी शासक राजा रामचंद्र देव ने अपनी मां की स्मृति में जाह्नवी नौले का निर्माण कराया था। नौले में लगे प्राचीन शिलापट में इसका उल्लेख है। पहले गंगोलीहाट के रावलगांव, हाट, बाजार आदि क्षेत्रों की पूरी जलापूर्ति इसी नौले से होती थी। वर्ष 1990 के बाद गंगोलीहाट नगर की आबादी बढ़ने के साथ ही पानी की किल्लत महसूस होने लगी। मौजूदा समय में नगर और आसपास के क्षेत्रों को लिफ्ट पेयजल योजना से जलापूर्ति हो रही है, लेकिन जाह्नवी नौला आज भी आसपास के लोगों की जरूरत को पूरा कर रहा है।
गुप्तगंगा से आता है नौले में पानी
नौले में जल करीब 10 किमी दूर शैलशिखर की पहाड़ी में स्थित गुप्तगंगा से आ रहा है। इसके लिए भूमि के भीतर पत्थरों की स्लेट की नाली बनी हुई बताई जाती है। रावल गांव निवासी अवकाश प्राप्त शिक्षाधिकारी 80 वर्षीय किशन सिंह रावल बताते हैं कि उनके पुरखों ने 20वीं शताब्दी की शुरुआत में गुप्तगंगा में चूना डालकर परीक्षण किया। चूनायुक्त पानी जाह्नवी नौले के साथ ही 40 किमी दूर रामेश्वर मंदिर (पनार) के नौले में निकला था। कुमाऊं के धार्मिक स्थलों का प्रमाणिक ग्रंथ माने जाने वाले महर्षि वेद व्यास लिखित स्कंदपुराण के मानसखंड के शैलेश्वर महात्म्य में गुप्तगंगा को गुप्त सरस्वती कहा गया है। गुप्तगंगा के भीतर करीब 20 मीटर सुरंग में बैठकर जाना पड़ता है। उसके बाद जल का भंडार दिखाई देता है।
अविरल जलधारा के पीछे संरक्षण की सोच
जाह्नवी नौले में अविरल बहती जल धारा के पीछे संरक्षण की सोच है। गुप्तगंगा क्षेत्र में घने जंगल प्राचीन काल में भी थे, आज भी हैं। स्थानीय लोग जंगलों की काफी हिफाजत करते हैं। नौले का उपयोग करने वाले महाकाली मंदिर के पुजारी रावल समुदाय के लोग भी नौले के संरक्षण के लिए लगातार प्रयत्नशील रहते हैं। ऐतिहासिक नौले में किसी तरह की छेड़छाड़ न हो, नौले को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे, इस दृष्टिकोण से करीब 20 साल पहले नौले को लोहे की जाली से बंद कर दिया गया। नौले के बाहर दो स्नानागार बना दिए गए। यहीं से लोग जल भरकर ले जाते हैं। जाखनी निवासी बहादुर सिंह भंडारी (62) बताते हैं कि गुप्तगंगा में जितना जल वर्तमान में है, उतना ही बचपन में भी उन्होंने देखा था। बताते हैं बरसात में मुहाने तक पानी आ जाता है। गर्मियों में 20 मीटर बाद ही नदीनुमा रेतपट्टिका से भरे जल के दीदार होते हैं। वह कहते हैं गुप्तगंगा के संरक्षण के लिए और पुख्ता प्रबंध होने चाहिए।