पिथौरागढ़। होली के पर्व को आपसी सद्भाव का प्रतीक माना जाता है। साथ ही यह वर्ष के पहला त्योहार भी है। आज भले ही उपभोक्तावादी और अलग-थलग रहने का प्रचलन बढ़ गया है। कई परंपरायें अब धूलधूसरित हो गई हैं। अलबत्ता किसी परिवार में शादी या अन्य कोई खुशी होने पर होली में गुड़ देने की परंपरा आज भी है।
बुजुर्गों के समय से गांवों में परंपरा रही थी कि किसी भी परिवार में वर्ष में कभी भी खुशी का पर्व (शादी, नामकरण) होने के बाद होली में गुड़ की धैली दी जाती थी। इस गुड़ की धैली को छलड़ी के पर्व पर शुभ आशीष वचनों और अबीर-गुलाल उड़ाने के बाद तोड़ा जाता था। इस गुड़ को सभी होल्यारों में बराबर बांटा जाता था।
अब गांव-गांव वाहन पहुंचने और अधिकांश ग्रामीणों के रोजगार के चलते बाहर होने से यह परंपरा काफी कम रह गई है। अब गुड़ के स्थान पर मिठाई दी जाती है। बावजूद इसके अभी सीमांत जिले के कई गांवों में गुड़ की धैली देने की परंपरा कायम है। इसी से सीमांत के गांवों में आपसी सौहार्द की मिठास भी बरकरार है।