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जवानों के उत्साह को और बढ़ा देते थे भारत माता की जय के नारे

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डीडीहाट (पिथौरागढ़)। भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 का युद्ध मात्र 13 दिन चला। तीन दिसंबर से शुरू हुआ युद्ध 16 दिसंबर को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के साथ ही समाप्त हो गया। महज 13 दिन चले इस युद्ध के दौरान भारतीय सेना के जांबाज पूरे साहस के साथ लड़े। आज भी इस सेना में अपनी जांबाजी दिखाकर पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने वाले युद्धवीर उस लड़ाई का जिक्र कर रोमांचित हो उठते हैं। इस लड़ाई के दो चश्मदीद जांबाजों की कहानी उनकी जुबानी-
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-1971 में युद्ध शुरू होने के समय मैं पांचवीं कुमाऊं में जम्मू के स्यालकोट सेक्टर के बकरपुर में तैनात था। लड़ते-लड़ते हमारी टुकड़ी पाकिस्तान में 15 किमी अंदर तक चली गई। युद्ध समाप्ति के साथ ही वापसी का फरमान आया, तब वापस लौटे। पूरी लड़ाई के दौरान भारतीय सेना हावी थी। पाकिस्तानी सेना के जवान भारतीय सेना के सामने कहीं नहीं टिके। बार्डर के आसपास युद्ध की शुरुआत में जो पाकिस्तानी सैनिक नजर आए वह बाद में भाग गए। -गोपाल सिंह पंवार, रिटायर्ड सूबेदार, डीडीहाट।

1971 में जब भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ, उस समय मैं सिग्नल कोर में मिजोरम में तैनात था। आदेश मिलते ही भारतीय सेना बार्डर पर पहुंच गई। सीमावर्ती गांवों के लोग जब भारत माता की जय के नारे लगाते थे तो जवानों का उत्साह दोगुने से अधिक बढ़ जाता था। इस युद्ध में भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी फौज को धूल चटा दी। जिस टुकड़ी में वे शामिल थे, वह टुकड़ी जैसे ही पाकिस्तान में घुसने वाली थी वापसी का फरमान आ गया था। पता चला कि पाकिस्तानी सेना ने अपने हथियार डाल दिए थे। यह सभी भारतीय जवानों के लिए बेहद हर्ष का विषय था। -धन सिंह कफलिया, पूर्व सैनिक सिग्नल कोर।
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