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शहरों की खाक छानने को मजबूर संसाधनों से भरपूर पहाड़ का युवा

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पिथौरागढ़। पहाड़ प्राकृतिक संसाधनों के मामले में धनी रहा है। सरकारी नियंत्रण वाले खनिज संपदाओं को यदि छोड़ भी दिया जाय तो यहां पर कृषि, बागवानी, पशुपालन, हस्तशिल्प, डेयरी, जड़ी-बूटी की खेती सहित कई अवसर हैं, जो पहाड़ के लोगों की अर्थव्यवस्था को मजबूत बना सकते हैं, लेकिन ठोस योजना के अभाव में अलग राज्य बनने के 18 साल बाद भी यहां का युवा अपने आसपास उपलब्ध संसाधनों को आजीविका बनाना छोड़कर नौकरी के लिए शहरों की खाक छानता फिर रहा है।
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उत्तराखंड और हिमाचल की जलवायु लगभग एक जैसी है। राज्य गठन के समय राजनीतिक दलों के नेताओं ने हिमाचल की तर्ज पर राज्य को स्थानीय संसाधनों की मदद से समृद्ध बनाने के दावे किए। युवाओं को भी इससे कई उम्मीदें जगी, लेकिन यह कोरी घोषणाएं साबित हुई। ऐसे में यहां के युवा इन संसाधनों को रोजगार के रूप में नहीं अपना सके। इसका नतीजा आज सरकारी नौकरी पाने की कतार में खड़ी 9.50 लाख बेरोजगारों की फौज है। चिंताजनक बात यह है कि राज्य में हर साल औसतन एक लाख युवा बेरोजगारी की सूची में शामिल हो रहे हैं।

राज्य गठन के समय प्रदेश में 9.26 लाख हेक्टेयर की जो जोत भूमि थी 2004-05 में घटकर 9.21 लाख और 2010-11 आते-आते 9.13 लाख हेक्टेयर तक सिमट गई। मैदानी इलाकों में कॉलोनियां बनने, जबकि पहाड़ पर पलायन के कारण जोत में कमी आई। कृषि कार्य कम होने का असर दस्तकारी पर भी पड़ा और गांव-गांव में हजारों की संख्या में दस्तकार बेरोजगार हो गए। सरकार की ओर से नीतियां नहीं बनने से इन बेरोजगारों ने नौकरी के लिए शहरी क्षेत्रों की ओर जाना शुरू कर दिया। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में बागवानी की स्थिति और भी अधिक खराब है।
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राज्य बनने से पहले गांवों में जो फल पट्टियां थीं, वह पूरी तरह से सूख गई। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाने वाला माल्टा एवं नारंगी तक बाजार से लगभग गायब हो गया और इसकी जगह हिमाचल के कीनू ने ले ली। कभी कश्मीर के सेब की मिठास वाले मुनस्यारी एवं मल्ला दानपुर के सेब का उत्पादन अब केवल कागजों में ही हो रहा है। घाटी वाले क्षेत्रों में भी यही हालात हैं। आम एवं लीची के उत्पादन के बावजूद यह लोगों की आजीविका का हिस्सा नहीं बन सके हैं।

जो युवा यहां पर काम करना चाहते थे उन्हें कभी मौसम की मार तो कभी जंगली जानवरों के दखल ने हतोत्साहित कर दिया। जिन खेतों में सोना उगलने वाली जड़ी-बूटी या सब्जियों का उत्पादन हो सकता है वह खेत बंजर पड़े हैं। जड़ी-बूटी की खेती भी उच्च हिमालयी क्षेत्र के गिने चुने लोग ही कर रहे हैं। अच्छी आमदनी देने वाली जड़ी-बूटी की सबसे अधिक सप्लाई दवा कंपनियों को हिमाचल से होती है।

खेती कम होने का असर पशुपालन पर भी पड़ा है। यही कारण है कि जिस पर्वतीय क्षेत्र में कभी दूध का प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता था, वहां पर अब दिल्ली या अन्य बड़े शहरों से पैकेट का दूध सप्लाई हो रहा है। राज्य में लगभग चार हजार दुग्ध समितियां तो हैं बावजूद इसके यहां के बाजार में शहरी क्षेत्र से दूध सप्लाई करने वाली कंपनियों का ही दबदबा है।

हस्तशिल्प के क्षेत्र में भी सभी दावे खोखले साबित हुए। हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए धरातल पर कोई ठोस काम नहीं होने से चीनी वस्तुओं से बाजार पट गया है। यहां के दन, कालीन, चुटका, शाल, स्वेटर सहित अन्य ऊनी कपड़े अंतरराष्ट्रीय बाजार के बेहतरीन डिजायन के सामने फीके साबित हुए, लेकिन सरकारें आज भी महज दावे और वादे ही कर रही हैं।
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