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जागरूकता के अभाव में प्रदूषित हो चुके कई प्राकृतिक जलस्रोत

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पिथौरागढ़। पेयजल स्रोतों के भंडार पहाड़ आज खुद प्यासे हैं। प्राकृतिक जलस्रोत लगातार सूखते जा रहे हैं। दूसरी ओर देखरेख और जागरूकता के अभाव में प्राकृतिक स्रोतों का पानी पीने लायक नहीं रह गया है। सरकार और सरकारी मशीनरी के इतर आम जन भी पेयजल समस्या का बड़ा जिम्मेदार है। यही कारण है कि जिले की आबादी वाले इलाकों में दर्जनों प्राकृतिक स्रोतों का पानी पीने लायक नहीं रहा।
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जिले में सैकड़ों नौले, धारे और प्राकृतिक जलस्रोत हैं। पहले नगरी एवं ग्रामीण आबादी पेयजल और अन्य जरूरतों के लिए इन्हीं प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर थी। बड़ी पेयजल योजनाओं के बनने से पहले यही स्रोत पूरी आबादी के लिए पर्याप्त थे। बसासत बढ़ने के साथ ही इन परंपरागत स्रोतों पर दबाव बढ़ता गया। धीरे-धीरे रखरखाव के अभाव, असीमित दोहन, जल संरक्षण और संवर्द्धन के अभाव में प्राकृतिक स्रोत अपना स्वरूप खोते गए। हालात यह हैं कि आज सैकड़ों स्रोतों का डिस्चार्ज पहले की अपेक्षा 30 से 90 फीसदी तक कम हो चुका है। रही-सही कसर अनियोजित और अनियंत्रित निर्माण ने पूरी कर दी है।

अकेले पिथौरागढ़ में ही एक दर्जन से अधिक स्रोतों का पानी पीने के लायक नहीं रह गया है। कुछ साल पहले जल संस्थान के सर्वे में इसका खुलासा हुआ था। इसके साथ ही डीडीहाट, बेड़ीनाग, गंगोलीहाट, धारचूला आदि नगर, कस्बों में भी स्रोतों के डिस्चार्ज में कमी आई और प्रदूषण बढ़ा। दरअसल आबादी बढ़ने के साथ ही प्राकृतिक स्रोतों के इर्दगिर्द बेतरतीब निर्माण हुए। इससे स्रोतों के डिस्जार्च पर प्रभाव तो पड़ा ही। सीवरेज व्यवस्था न होने के चलते गंदगी रिसकर प्राकृतिक स्रोतों तक पहुंच गई।
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सामूहिकता की भावना से दूरी ने बढ़ाई मुश्किलें
पुराने समय में नौले, धारों आदि प्राकृतिक जलस्रोत के रखरखाव और संरक्षण के लिए सामूूहिक भागीदारी थी। बुजुर्ग बताते हैं कि स्रोत पर निर्भर गांव या आबादी नियमित रखरखाव एवं सफाई करती थी। स्रोतों के मूल उद्गम और आसपास पेड़ लगाए जाते थे। स्रोत से पानी के दोहन की मात्रा भी तय थी। इसके साथ ही स्रोतों के मूल और आसपास चालखाल भी बनाए जाते थे। इससे स्रोत रिचार्ज होते रहते थे। नियमित देखरेख एवं संरक्षण के चलते कम बारिश और बर्फबारी में भी पेयजल की कमी नहीं होती थी, लेकिन वर्तमान में संरक्षण तो दूर स्रोतों के इर्दगिर्द ही कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए हैं। स्रोतों के रखरखाव और संरक्षण के लिए सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना कम होती जा रही है। नतीजतन स्रोत या तो सूखते जा रहे हैं, या फिर प्रदूषित हो चुके हैं।

जंगल-मानव के बीच दूरी से प्राकृतिक स्रोतों पर खतरा
पहले लोग ऊर्जा के परंपरागत साधनों पर निर्भर थे। लकड़ी आदि के लिए वनों पर निर्भरता थी। निर्भरता के बीच भी लोग वनों का पूरा ध्यान रखते थे। वनों का नियंत्रित दोहन किया जाता था। बाकायदा वनों पर निर्भर आबादी बारी-बारी सुरक्षा और संरक्षण में भूमिका अदा करती थी। वर्तमान में ऊर्जा के अन्य साधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके बावजूद वन सुरक्षित नहीं रह गए हैं और लगातार सिमट रहे हैं। वन संरक्षण कानून लागू होने और हकहकूक छिनने के बाद जंगल-मानव के बीच दूरी से पेयजल के प्राकृतिक स्रोतों पर भी खतरा मंडरा रहा है। जंगलों के सिमटने से स्रोतों के मूल उद्गम पहले की तरह पानी सहेज नहीं पा रहे हैं।
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