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गकंधी के योगदान और दर्शन पर आयोजित हुई गोष्ठी

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राजकीय महाविद्यालय देवप्रयाग में गांधी दर्शन विषय पर राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई की ओर से आचार्य चक्रधर जोशी व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। जिसमें वक्ताओं ने गांधी के योगदान और दर्शन पर अपने विचार रखे।
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बृहस्पतिवार को आयोजित कार्यशाला में कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अशोक कुमार मेंदोला ने कहा कि महात्मा गांधी भारतवर्ष को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे। उन्होंने माना था कि भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है। इसलिए उन्होने ग्राम-विकास को प्राथमिकता में रखा था। इसी कारण गांधी ने बड़े-बड़े उद्योगों को नहीं, वरन् छोटे-छोटे उद्योगों को महत्व प्रदान किया। डा. मेंदोला ने कहा कि गांधी शिक्षा से अर्थशास्त्री नहीं थे, किन्तु इस विषय में भी उनका चिंतन क्रांतिकारी है। उन्होंने जरूरत से अधिक संग्रह करने को चोरी की संज्ञा दी। कहा कि इंसान की कमाई का मकसद केवल सांसारिक सुख पाना ही नहीं, बल्कि अपना नैतिक और आत्मिक विकास करना है। इसीलिए उन्होंने त्यागमय उपभोग की बात का समर्थन किया था। मुख्य वक्ता प्राचार्य डॉ. विद्याधर पांडेय ने कहा कि भारत की आजादी में महात्मा गांधी का योगदान अतुल्य है। पूरी दुनिया उन्हें सत्य और अहिंसा के पुजारी के रूप में जानती है। अपने सादा जीवन और उच्च विचारों के चलते उन्होंने विश्व को सत्य और अहिंसा की ताकत से परिचित कराया। डॉ. महेशानंद नौरियाल उपाचार्य संस्कृत ने गांधी-दर्शन के चार आधारभूत सिद्धांत सत्य, अहिंसा, प्रेम और सद्भाव पर अपने विचार रखे। डॉ. मोहम्मद आदिल कुरेशी असिस्टेंट प्रोफेसर जंतु विज्ञान ने कहा कि बापू सर्वधर्म समभाव के प्रणेता थे। उनकी प्रार्थना सभाओं में गीता के श्लोक, रामायण की चौपाइयां, विनय-पत्रिका के पद के साथ ही नरसी मेहता व रवींद्रनाथ टैगोर के भजन आदि के प्रमुख अंशों का पाठ होता था। इसके अलावा डा. दिनेश कुमार टम्टा, डॉ. अर्चना धपवाल आदि ने भी अपने विचार रखे।
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