श्रीनगर। कीर्तिनगर विकासखंड के लोस्तु बडियारगढ़ क्षेत्र स्थित घंडियालधार क्वीली गांव की मनोरमा भंडारी रिंगाल शिल्प के माध्यम से आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। वह पारंपरिक पहाड़ी कला को जीवित रखते हुए इसे आजीविका का मजबूत माध्यम बना रही हैं।
मनोरमा भंडारी हिमानी स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं और क्षेत्र में पाए जाने वाले प्राकृतिक रिंगाल से टोकरियां, फूलदान, कूड़ेदान, पूजा की टोकरियां, पेन स्टैंड, लैंप शेड सहित कई आकर्षक सजावटी उत्पाद तैयार कर रही हैं। उनके उत्पादों की बाजार में लगातार मांग बढ़ रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के ब्लॉक मिशन प्रबंधक मुकेश देव ने बताया कि रिंगाल शिल्प पूरी तरह प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल कला है। यह प्लास्टिक के विकल्प के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। उन्होंने कहा कि यह शिल्प ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देने के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा रहा है। वहीं दूसरी ओर मनोरमा भंडारी ने बताया कि घरेलू कार्यों की जिम्मेदारियों के कारण वह इस काम को पूरा समय नहीं दे पाती हैं। इसके बावजूद उनके उत्पादों की मांग लगातार बनी हुई है, लेकिन समय की कमी के कारण उत्पादन पर्याप्त नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि प्रशिक्षण, संसाधन और बाजार की बेहतर सुविधा मिले तो रिंगाल शिल्प ग्रामीण महिलाओं की आर्थिकी मजबूत करने का बड़ा माध्यम बन सकता है।