कहा, राज्य बनने के बाद जमीनों के आवंटन, अनुमतियों व भूमि घोटालों पर सरकार श्वेत पत्र करे जारी
पौड़ी। प्रदेश सरकार ने सशक्त भू-कानून लागू तो कर दिया, लेकिन इसमें भी कई खामियां हैं। हालांकि इससे प्रदेश की जमीनें काफी हद तक बच सकेंगी। लेकिन हरिद्वार व यूएस नगर में इसे लागू नहीं करके बाहरी लोगों के लिए पूरी व्यवस्था बनाई गई है। कहा कि प्रदेश सरकार से राज्य बनने के बाद जमीनों के आवंटन, अनुमतियों व भूमि घोटालों पर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए।
पूर्व सहायक भू-लेख अधिकारी नरेश चंद्र नौडियाल ने बताया कि सरकार को उत्तराखंड की अस्मिता, अवधारणा को साकार करने के लिए इस संदर्भ में सुझाव भेजे गए थे, जिस पर सरकार ने गौर नहीं किया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में जमीनों व प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में प्रभावशाली राजनेताओं व नौकरशाहों की बड़ी भूमिका रही है। सरकार ने ऐसे लोगों के खिलाफ कार्यवाही करने की कोई मंशा जाहिर नहीं की है।
क्षेत्र के गबर सिंह नेगी, प्रदीप सिंह, राजेंद्र सिंह आदि ने कहा कि एक्ट में सरकारी भूमियों के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। इसमें केवल कृषि भूमि की बात की गई है। सशक्त भू-कानून का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड के मूल निवासियों और यहां के लोगों को अपनी खेती -किसानी व प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक दिया जाना चाहिए।
सशक्त भू-कानून में ये बदलाव होने चाहिए
मैदानी क्षेत्रों की तर्ज पर पहाड़ों में भी एलएमसी (भूमि प्रबंधन समिति) लागू हो। समिति गांवों में खाली भूमि पर विभिन्न प्रकार के सामूहिक स्वरोजगार, पर्यटन, कृषि आदि कार्यों के लिए उपयोग में लाए। पहाड़ों की खाली भूमि सरकार से हटाकर ग्राम सभाओं व पंचायतों को दी जाए। अतिरिक्त भूमियों को भूमिहीनों व ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में बांटी जाएं। कृषि भूमि के लिए ठोस योजना बने व बंजर खेतों को फिर से आबाद करने लिए भी कारगर योजना बने। 2018 के असीमित भूमि की खरीद के कानून को वापस लिया जाना चाहिए।