उत्तराखंड की मातृभाषाओं के लिए इस साल का अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) महत्वपूर्ण है। यह साल जनगणना वर्ष है, जिसमें मातृभाषा बोलने वालों की गणना से नया आयाम मिलेगा।
भाषाविद गणेश देवी ने भी अपने शोध में उत्तराखंड की मातृभाषाओं का विस्तार से जिक्र किया है। गढ़वाली भाषा 16वीं शताब्दी से ही जानी जाती है। राजशाही के दौर में गढ़वाली राजभाषा रही, लेकिन बिरही की आपदा (1894) में श्रीनगर के डूब जाने के साथ ही वहां पुस्तकालय में संरक्षित गढ़वाली साहित्य संपदा भी नष्ट हो गई। गढ़वाली साहित्यकार नरेंद्र कठैत बताते हैं कि कहा कि नरेंद्र सिंह नेगी का गढ़वाली साहित्य संसार गढ़वाली भाषा को एकरूप दे रहा है। कवि गणेश खुगशाल गणि ने कहा कि गढ़वाली भाषा समृद्ध है। 2021 जनगणना में इस भाषा को बोलने वालों की संख्या का सही आंकलन होगा, जिससे 8वीं अनुसूची में इसके शामिल होने को लेकर अहम कड़ी साबित होगा।
जनपद पौड़ी व रुद्रप्रयाग में गढ़वाली भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। वर्ष 2019 में कक्षा एक से पांच तक रुद्रप्रयाग के ऊखीमठ ब्लाक व पौड़ी के पौड़ी ब्लाक में पाठ्यक्रम का एक बैच पास हो चुका है।
- नई शिक्षा नीति में लोकभाषा को महत्व दिया जाना इस ओर संकेत दे रहा है कि हमारी लोक भाषाएं समृद्ध है, लेकिन इसे संरक्षित किए जाने और आगे बढ़ाने के लिए हमें स्वयं ही प्रयास करने होंगे। - नरेंद्र सिंह नेगी, लोक गायक
- प्रदेश के समस्त माध्यमिक विद्यालयों के पुस्तकालयों में गढ़वाली भाषा साहित्य को रखा जाएगा। सरकार लोककला, साहित्य व संस्कृति के संरक्षण को लगातार महत्वपूर्ण कदम उठा रही हैं। -घनानंद घन्ना, उपाध्यक्ष, उत्तराखंड लोक कला, साहित्य एवं संस्कृति परिषद।