फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गढ़वाल में पटरी पर नहीं स्वास्थ्य सेवाएं

विज्ञापन
विज्ञापन
केस एक -
विज्ञापन

25 जुलाई को कर्णप्रयाग-ग्वालदम मोटर मार्ग पर कार हादसे में तीन लोग घायल हुए थे। गंभीर रूप से घायल एक मरीज को सीएचसी कर्णप्रयाग लाया गया। लेकिन सुविधाएं और डाक्टर नहीं होने से उसे सीधे हायर सेंटर रेफर कर दिया गया।

केस दो -
27 जुलाई को मैखुरा के अनिल कुमार वायरल फीवर से पीड़ित होकर सीएचसी कर्णप्रयाग पहुंचे। एक दिन एक रात अस्पताल में भर्ती रहने के बाद उन्हें सुविधाओं के अभाव में 28 जुलाई को जिला अस्पताल रुद्रप्रयाग के लिए रेफर कर दिया गया।
विज्ञापन


केस : 3
रुद्रप्रयाग के सौड़ी गांव निवासी देवीलाल की विगत दिनाें हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो गई थी। देवीलाल के भाई कुंदीलाल ने बताया कि परिजन उन्हें अगस्त्यमुनि अस्पताल ले गए थे लेकिन समय पर उचित इलाज नहीं मिलने से उन्हें बचाया नहीं जा सका।

केस : 4
रुद्रप्रयाग जिला अस्पताल से विगत दिनाें भुवनेश डिमरी की गर्भवती पत्नी पिंकी को यह कहकर रेफर किया गया कि उनकी नार्मल डिलीवरी के बजाए सर्जिकल डिलीवरी होगी। भुवनेश ने बताया कि जब वह श्रीनगर पहुंचे तो उनकी पत्नी की नार्मल डिलीवरी हुई।

केस-5
पौड़ी जिले में कोट ब्लाक के कापड़ गांव निवासी एक गर्भवती महिला की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के कारण मौत हो गई थी। पिछले वर्ष 13 मई को कापड़ गांव निवासी 23 वर्षीय दीपिका की अचानक तबियत खराब हो गई। लेकिन गांव के अस्पताल में डाक्टर नहीं होने से उसे समय पर इलाज नहीं मिल सका। फिर उसे पौड़ी लाया गया। पौड़ी के महिला अस्पताल से उसे श्रीनगर रेफर किया गया था और फिर श्रीनगर से देहरादून को रेफर किया गया था। 14 मई की रात को दून अस्पताल में उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई थी।


--------
गढ़वाल। तमाम सरकारी दावों और घोषणाओं के बावजूद पहाड़ों की स्वास्थ्य सेवाएं पटरी पर नहीं आ सकी हैं। डाक्टर पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं हैं। पांच पर्वतीय जिलों का हाल यह है कि अधिकांश अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं। जहां डाक्टर हैं वहां चिकित्सा सुविधाएं का टोटा बना हुआ हैं। अस्पताल रेफरल सेंटर बन गए हैं। कहीं अकुशल और प्रशिक्षु डाक्टरों के हाथों मरीज जान गंवा रहे हैं तो कहीं समय से इलाज नहीं मिलने से रोगी दम तोड़ देते हैं। मंगलवार को टिहरी जिले में लचर स्वास्थ्य सेवाओं के चलते बच्चा जनने के बाद एक महिला की मौत हो गई थी।
---------------------------------
पौड़ी जिले में रेगुलर डाक्टरों के 172 पद खाली
19 की ही तैनाती, 48 डाक्टर संविदा पर
पौड़ी। जिले में ग्रामीण क्षेत्रों में डाक्टरों के स्वीकृत 191 पदों में 172 पद रिक्त पड़े हुए हैं। शासन की ओर से संविदा पर 22 एलोपैथिक और 26 आयुर्वेदिक डाक्टर तैनात किए गए हैं। डाक्टर नहीं होने से लोग इलाजा के लिए भटक रहे हैं। सीएमओ डा. एके सिंह का कहना है कि डाक्टरों की कमी से लोगों को दिक्कतें होना स्वाभाविक है। यह मामला शासन के संज्ञान में है।

------------------------
जिला अस्पताल में सर्जन नहीं, ओटी में ताले
नई टिहरी। जिला अस्पताल बौराड़ी में सर्जन तक नहीं है। ओटी में ताले लटके हैं। जिले के किसी भी अस्पताल में रेडियोलाजिस्ट नहीं है। एक्सरे और अल्ट्रासाउंड के लिए लोगों को प्राइवेट अस्पतालों में जाना पड़ता है। जिले में डाक्टरों के स्वीकृत 168 पदों में से 82 खाली पड़े हैं। बौराड़ी में तीन वर्ष पहले लाखों की लागत से ब्लड बैंक का निर्माण किया गया था, लेकिन सर्जन नहीं होने से इसमें भी ताले लटके हुए हैं। नरेंद्रनगर के कुखुई में दो वर्ष पहले 16 लाख की लागत से स्वास्थ्य उप केंद्र बनाया गया है लेकिन डाक्टरों और कर्मचारियों की तैनाती नहीं होने से इसका लाभ जनता को नहीं मिल सका है। लोगों को इलाज के लिए 20 से 25 किमी दूर नरेंद्रनगर जाना पड़ता है।
------------------------
फार्मासिस्टों के भरोसे रुद्रप्रयाग के सरकारी अस्पताल
रुद्रप्रयाग। जिले के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की लंबे समय से कमी है। वर्ष 2006 में यहां जिला अस्पताल बन तो गया, लेकिन डॉक्टरों के पद पूरे नहीं भर पाए। यहां 22 डॉक्टरों की जगह 11 डॉक्टर (दो संविदा) ही कार्यरत हैं। अस्पताल मेें बाल रोग विशेषज्ञ, वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट और सर्जन जैसे महत्वपूर्ण पद खाली चल रहे हैं। ग्रामीण अंचलों मेें स्थिति और बुरी है। स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल भवन तो बना दिए, लेकिन यहां डॉक्टर नहीं भेज पाए। ग्रामीणों के लिए फार्मासिस्ट या बंगाली डॉक्टर ही डॉक्टर हैं। इन्हीं के भरोसे लोगों की सेहत है।
जिले के दोनों सामुदायिक अस्पताल जखोली और अगस्त्यमुनि में भी स्थितियां दयनीय है। सीएचसी अगस्त्यमुनि में नौ पद स्वीकृत हैं, लेकिन डॉक्टर सिर्फ तीन हैं। वहीं सीएचसी जखोली पीपीपी मोड में जाने के बाद भी अव्यवस्थाआें से घिरा हुआ है। अस्पताल में चिकित्सक तो हैं, लेकिन संसाधनाें की कमी बनी हुई है। इसके अलावा 19 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मात्र तीन डॉक्टर तैनात हैं। वहीं 22 एलोपैथिक अस्पताल में आठ डॉक्टर कार्यरत हैं। डॉक्टरों की कमी के कारण जिला अस्पताल सहित अन्य अस्पतालों से मरीजों को रेफर कर दिया जाता है।
कर्णप्रयाग में तीन तो थराली में दो डाक्टर
कर्णप्रयाग। सुविधाओं और चिकित्सकों के अभाव में सीएचसी कर्णप्रयाग रेफरल सेंटर बना हुआ है। गैरसैंण, थराली, देवाल और नारायणबगड़ से यहां पहुंचने वाले घायल और अन्य बीमार मरीजों को जहां सीधे अन्यत्र रेफर किया जाता है। वहीं अस्पताल में भर्ती मरीजों और घायलों में भी 70 फीसदी से अधिक रेफर होते हैं। शासन से स्वीकृत 11 विशेषज्ञ डाक्टरों में अस्पताल में सिर्फ तीन डाक्टर कार्यरत हैं। अल्ट्रासाउंड मशीन दो साल से बंद पड़ी है। कर्णप्रयाग में ट्रामा सेंटर शुरू नहीं हो सका है। सीएचसी थराली जहां शोपीस साबित हो रहा है, वहीं गैरसैंण सीएचसी के पीपीपी मोड में संचालित होने से चिकित्सक और सुविधाओं का अकाल बना है।
विज्ञापन

---------------------------------
चमोली जिला अस्पताल में 8 वर्ष से नहीं फिजिशियन
गोपेश्वर। सीमांत चमोली जिले में चिकित्सकों के 140 स्वीकृत पदों के विपरीत मात्र 49 चिकित्सक ही तैनात हैं। इनमें भी 22 चिकित्सक संविदा पर तैनात हैं। वर्ष 2013 में स्वास्थ्य निदेशालय ने 30 ट्रेनी चिकित्सकों से जिले में कार्य करने का अनुबंध किया था, जिनमें से 24 चिकित्सकों ने जिले में ज्वाइनिंग ही नहीं दी। छह चिकित्सकों ने जिले के विभिन्न अस्पतालों में अपनी तैनाती तो दी। लेकिन पिछले अप्रैल माह में तीन डाक्टर नौकरी छोड़कर चले गए। जबकि अनुबंध के तीन चिकित्सक जिले में कार्यरत हैं। जिला अस्पताल में पिछले आठ वर्ष से फिजिशियन और दो वर्षों से पैथोलॉजिस्ट के पद रिक्त चल रहे हैं। उधर, सीएमओ डा. अजीत गैरोला का कहना है कि चमोली जिला पर्यटन और तीर्थाटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। यहां चिकित्सकों की तैनाती होनी चाहिए। इसके लिए स्वास्थ्य मंत्री से भी बात की गई है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें