बदरी-केदार के दर्शनों के लिए घर-परिवार के सदस्यों के साथ निकले थे, लेकिन उनमें से कुछ घाटी में आई तबाही के बाद से लापता हैं। खुद आसमानी कहर से बचकर उफान मार रही अलकनंदा और भागीरथी से बाहर तो निकल आए हैं, लेकिन आंखों के सामने अभी भी पहाड़ से टूटता कहर कौंध रहा है। शायद ही इनमें से कोई दोबारा पहाड़ आने से पहले ना कांपे।
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फंस गए मलबे में
टेकराज साहू पांच मित्रों के साथ लावण रायपुर, छत्तीसगढ़ से चारधाम यात्रा पर निकले थे, लेकिन बदरीनाथ से लौटते समय पांडुकेश्वर के समीप लामबगड़ में आए मलबे में फंस गए। खुद जैसे तैसे बाहर निकल आए हैं लेकिन साथ में आया एक परिवार पहाड़ों में ही गुम हो गया। टेकराज कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और श्रीनगर में उफान पर बह रही अलकनंदा के किनारे बिखरी जिंदगियों को देखते हुए देहरादून पहुंच गए हैं, लेकिन मन अभी भी पहाड़ में खोया है।
टेकराज कहते हैं कि हम कैसे न परेशान हों, पहाड़ में प्रशासन की ओर से कुछ भी राहत कार्य नहीं हो रहे। उनके भाई योगेश साहू और भाभी अंजू साहू का भी कहीं पता नहीं चल पा रहा है।
प्रेम लाल साहू भी अलकनंदा घाटी में मची तबाही से कांप उठते हैं। रुआंसे मुंह से कहते हुए उन्होंने बताया कि हम तो पूरी श्रद्धा से आए थे लेकिन पता नहीं कुदरत क्यों रूठ गई। कुछ ऐसा ही हाल राकेश कुमार का भी है। राकेश भी परिवार के सदस्यों से दो दिनों से बात नहीं कर पाए हैं।
खौफ लिए उत्तराखंड से रुखसत
राकेश के परिजनों की आखिरी लोकेशन रविवार को केदारनाथ में थी लेकिन उसके बाद से किसी का पता नहीं चल सका है। ऐसे ही न जाने कितने लोग पहाड़ का खौफ लिए उत्तराखंड से रुखसत हो गए, जिनमें उनके परिजन और परिचितों की चीखें गुम हो गई हैं।