केदार और गंगोत्री घाटी में जलप्रलय को लगभग 20 दिन हो रहे हैं। आपदा में जानमाल का भारी नुकसान तो हुआ ही साथ ही सैकड़ों के आशियाने भी छिन गए।
लोग उम्मीदभरी निगाहों से सरकार और शासन को देख रहे हैं। फौरी जरूरत रसद के अलावा एक अदद छत की है। सरकार के पास लोगों को छत मुहैया कराने की तात्कालिक तौर पर कोई योजना नहीं दिख रही है। ऐसे में इन इलाकों के पीड़ितों की पुरानी पीढ़ी को केदार कुटी की बड़ी शिद्दत से याद आ रही है। जिसके निर्माण के लिए उन्हें 1991 में भूकंप पीड़ित होने पर मिली थीं।
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चौबीस वर्ष गुजर गए। तब भूकंप से उत्तरकाशी, टिहरी और चमोली जिले में भारी तबाही मची थी। अब जलप्रलय का निशाना भी यही जनपद बने हैं। तब लखनऊ में बैठी सरकार ने सरकार ने तत्काल केदार कुटियों का निर्माण कर दीर्घकालीन राहत और पुनर्वास के काम साथ-साथ किए थे।
इस बार कोई योजना नहीं
सरकार ने तब हर गांव में एक से अधिक केदार कुटिया का निर्माण कराया था, ताकि अपने घरों का निर्माण करने तक लोग वहां सामूहिक रूप से रह सकें। यह केदार कुटियाएं गांवों में अब भी सामुदायिक कार्यों के लिए उपयोग में आ रही हैं। अब सत्ता पास ही देहरादून में है। लेकिन इस बार लोगों को छत मुहैया कराने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं दिख रही है।
लोक सेवक संघ के अध्यक्ष बुद्धि सिंह पंवार बताते हैं कि भूकंप के दौरान प्रभावित परिवारों को हडको की ओर से नवनिर्माण के लिए बीस हजार रुपये का ऋण भी दिया गया। जिसे बाद में माफ कर दिया गया था। तब सरकार ने घर बनाने के लिए 36 टिन की चादरें, बीस कट्टे सीमेंट और तीन कुंतल सरिया भी निशुल्क मुहैया कराई थी। तब प्रत्येक परिवार को इकाई माना गया था। ऐसा ही इस बार भी किया जाना चाहिए।
ऐसे बनी थी केदार कुटी
केदार कुटी का डिजायन भूकंपरोधी तकनीकी से किया गया था। इसमें लोहे केएंगिल खड़े कर उन्हें लोहे की टीन से ढका गया था। जबकि फर्श सीमेंट का था। एक केदार कुटी का अमूमन माप 40 गुणा 20 फुट तक था। यह एक-दो दिन में तैयार हो जाती है।
आपदा पीड़ितों के लिए भी मुफीद
लोगों के घर टूट गए हैं। कई स्कूल भी क्षतिग्रस्त हैं। ऐसे में केदार कुटी लोगों को शरण देने के लिए मुफीद हो सकती है। कारण लगातार हो रही बारिश में आखिर कब तक लोग टेंट में रहेंगे। लोहे की टिन से बनी होने के कारण इससे बारिश में सामान भी खराब नहीं होगा।