अलग राज्य बनने के बाद तत्कालीन भाजपा सरकार ने क्षय रोगियों को ‘घर बैठे समुचित इलाज के लिए पूर्ण उपचार पाएं’ नामक योजना शुरू की थी। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अजय भट्ट ने वर्ष 2003 में यह योजना शुरू की थी। इसे डाट्स के नाम से भी जाना गया। इस योजना के शुरू होने के बाद यहां के क्षयरोगाश्रम में पहुंचने वाले मरीजों की संख्या साल दर साल घटती गई, हालांकि उक्त योजना भी अपने उद्देश्यों में खरी नहीं उतरी।
डाट्स के तहत रोगियों को पार्सल से दो माह की दवा भिजवाने का प्रावधान था। इस योजना के शुरू होने के बाद अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की संख्या घटती गई। आंकड़ों पर नजर डालें तो सैनिटोरियम में 2001 में 10316, 2002 में 10802, 2003 में 11636, 2004 में 8156, 2005 में 6479, 2006 में 5735, 2007 में 5666, 2008 में 5604, 2009 में 4974, 2010 में 5121, 2011 में 4622, 2012 में 4500, 2013 में 4000, 2014 में 3761, 2015 में 3615 तथा इस वर्ष दिसंबर के पहले हफ्ते तक लगभग 2000 मरीज ही ओपीडी में पंजीकृत हुए हैं।
डाट्स योजना शुरू होने के बाद अस्पताल में रोगियों को भर्ती करने का प्रावधान भी खत्म हो गया। केवल उन्हीं मरीजों को भर्ती किया जाने लगा, जिनकी स्थिति बेहद दयनीय हो। ऐसे में नए मरीजों के अस्पताल पहुंचने का रास्ता एक तरह से बंद हो गया। चूंकि डाट्स योजना के तहत मरीजों को घर पर ही दवाइयां उपलब्ध कराई जाने लगी, लेकिन इसकी समुचित मॉनिटरिंग न होने के कारण मरीजों को इसका लाभ नहीं मिला। आंकड़े बताते हैं कि डाट्स से मिली दवा के सेवन में लापरवाही बरतने पर लगभग 150 मरीज वापस सैनिटोरियम में इलाज के लिए पहुंचे। इनमें कई रोगी ऐसे थे, जो एमडीआर (मल्टी ड्रग्स रजिस्टेंस) की श्रेणी में जा पहुंचे, जहां उनका इलाज संभव नहीं था।
- सैनिटोरियम के हालात बहुत खराब हैं। मैंने क्षयरोगाश्रम के मौजूदा हालातों की जानकारी स्वास्थ्य मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को पूर्व में दी है। सुझाव दिया है कि यहां क्षयरोग के इलाज के साथ-साथ 100 शैय्याओं वाला अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त ऐसा मॉडल अस्पताल स्थापित किया जाए जहां मरीजों को और भी अधिक बेहतर इलाज की सुविधा मिल सके। इस मुद्दे को एक बार फिर मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा।
सरिता आर्या, संसदीय सचिव एवं विधायक नैनीताल विधानसभा क्षेत्र
सैनिटोरियम की समस्याओं के बाबत महानिदेशक स्वास्थ्य को लिखित सूचना भेजी जा चुकी है। सुधार के लिए सुझाव भी दिए गए हैं। शासन स्तर से अभी तक अस्पताल की समस्याओं को हल कराने के लिए न तो बजट उपलब्ध हुआ है और न ही कोई दिशा निर्देश।
विनोद कुमार ढौडियाल, प्रमुख अधीक्षक सैनिटोरियम भवाली