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क्या प्रदेश में भाजपा को ‘पुश कर’ पाएंगे धामी, दायित्व नाइट वाचमैन का और अपेक्षा मैच जिताने की, पुष्कर की राह दुष्कर करेंगी तमाम चुनौतियां

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नैनीताल। प्रदेश में लंबे समय से पौड़ी जिला सत्ता का केंद्र बना हुआ था। अनेक मुख्यमंत्री यहीं से सत्ता की सीढ़ियां चढ़ कर मुख्यमंत्री बने। अब अचानक परिस्थितियों ने ऐसी करवट बदली कि मुख्यमंत्री के साथ ही सत्ता का केंद्र भी बदल कर गढ़वाल से कुमाऊं में शिफ्ट हो गया। हालांकि भाजपा के लिए यह सामान्य बात है लेकिन जिसके मुख्यमंत्री बनने की कल्पना कम ही लोगों ने की थी, ऐसे युवा चेहरे पर भाजपा ने भरोसा जताया है। इस निर्णय को सही या गलत साबित करना पुष्कर सिंह धामी के ही हाथ में है। उनके सामने तमाम बड़ी और गंभीर चुनौतियां हैं। भारी अपेक्षाओं और उम्मीदों के बीच काम करने को मिले मात्र पांच माह के समय को देखते हुए उनकी स्थिति कुछ ऐसी ही है जैसे क्रिकेट में किसी नाइट वाचमैन को मैच जिताने की जिम्मेदारी दे दी जाए।
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सबसे बड़ी अपेक्षा तो चुनाव तक प्रदेश में भाजपा की स्वीकार्यता को बढ़ाना और और चुनाव जितवाने की है। इसके साथ ही मंत्रिमंडल में अपने से उम्र और अनुभव में बड़े नेताओं के साथ सामंजस्य बिठाना और उन्हें साधे रखना भी आसान नहीं है। भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनौती में अवसर तलाशने के नारे का बहुत उदाहरण दिया जाता है। यहां अवसर के साथ चुनौतियां ज्यादा मिली हैं। ऐसे में सभी की निगाह इस ओर लगी है कि वे इन हालात में भाजपा को कितना ‘पुश कर’ पाएंगे कि वह चुनावी साल में वांछित उद्देश्य प्राप्त कर सके।
प्रदेश अभी गंभीर समस्याओं के दौर में है। कोरोना अभी टला नहीं है और तीसरी लहर का खतरा बताया ही जा रहा है। बीते डेढ़ वर्षों में कोरोना की वजह से तमाम कार्य और जन अपेक्षाएं अधूरी हैं। कोरोना से पर्यटन सहित तमाम कारोबारियों की कमर टूट गई है और उन्हें बिजली, पानी सहित अन्य टैक्सों में छूट के साथ ही मदद की भी दरकार है। कर्मचारियों की बहुत सी मांगों पर निर्णय नहीं हो पाया हैष बदरी केदार देवस्थानम बोर्ड पर तस्वीर साफ नहीं हुई है और क्षेत्रीय लोगों में इस पर रोष है। जिस गैरसैंण प्रकरण के चलते पूर्व मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई थी उस पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं हुआ है। मंहगाई और बेरोजगारी की राष्ट्रीय समस्या यहां भी चरम पर है। दो सत्रों से स्कूल-कॉलेजों में नियमित पढ़ाई और परीक्षा नहीं हुई है... लिस्ट बहुत लंबी है।
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अवसरों में कमी के कारण युवा वर्ग में असंतोष और दिशाहीनता का खतरा मंडरा ही रहा है। अब एक युवा सीएम के बनने से उनकी अपेक्षाएं भी बहुत ज्यादा बढ़नी स्वाभाविक हैं। इन सबके बीच अफसरशाही, जो एक आध अपवाद छोड़कर प्रदेश में बड़े से बड़े नेता पर हावी रही है, उसको साधना भी पुष्कर के लिए दुष्कर हो सकता है। जाहिर है समस्याओं और अपेक्षाओं का अंबार है और मशीनरी व साथी ढुलमुल हैं। उन्हें अपनी क्षमता दिखाने के लिए समय भी बहुत कम मिला है, क्योंकि दिसंबर प्रथम सप्ताह में आचार संहिता लगनी है। ऐसे में उनके पास कार्यक्षमता दिखाने और इन ढेरों समस्याओं के निराकरण के लिए मात्र पांच माह का ही समय है।
इस सब के बीच भी पुष्कर के पास केंद्रीय कमान के भरोसे और सहयोग का ब्रह्मास्त्र, युवा वय की ऊर्जा और जोश के साथ अपनी क्षमता दिखाने का अवसर तो है ही। अपनी मानव संसाधन प्रबंधन और कानून की पढ़ाई का पूरा सदुपयोग उनके बहुत काम आ सकता है। इन हालात में मैच में नाइट वाचमैन के रूप में आए पुष्कर क्या वाकई पार्टी की अपेक्षा के अनुरूप मैच भी जिता ले जाएंगे यह स्वयं उनका प्रदर्शन ही तय करेगा।
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