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बाघ बचाने में पूरा ध्यान, भालू को भुला दिया

Mon, 11 Sep 2017 02:05 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी
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शिकारी - फोटो : अमर उजाला
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हल्द्वानी। वन विभाग की निगाह में भालू उतना खास नहीं है जितना कि बाघ। प्रदेश में बाघ के संरक्षण पर तो जोर है, लेकिन अन्य वन्य जीवों पर किसी का ध्यान नहीं है। दो महीने में भालू की पित्त की थैली सहित चार तस्करों का पकड़े जाना यही इशारा करता है। भालुओं के लगातार शिकार के बाद भी वन महकमे की नींद नहीं टूटी है। यह तब है जबकि भालू सूची दो के तहत श्रेणीबद्ध वन्य जीव है। 
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प्रदेश के 71 फीसदी भू भाग में जंगल है। इनमें बाघ, गुलदार, भालू, हाथी आदि जंगली जानवर हैं। वन विभाग का बिल्ली प्रजाति के बाघ, गुलदार के संरक्षण पर ज्यादा जोर रहता है। इसके उलट, उतनी ही तेजी से दूसरे वन्य जीवों का भी शिकार हो रहा है। सबसे ज्यादा शिकार भालू का हो रहा है। कुमाऊं में ही पिछले दो महीने में चार भालुओं का शिकार हो चुका है।

प्रदेश में एक बार भी भालू की गणना तक नहीं की गई। वन्य जीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ की गणना में ट्रैपिंग कैमरा लगाए जाते हैं तो इनमें भालुओं की तस्वीर भी कैद होती है, लेकिन इनका आंकड़ा नहीं जुटाया जाता है। इतना ही नहीं भालू के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए भी पर्याप्त संसाधन व योजना नहीं है। भालू के शिकार और अंगों की तस्करी रोकने के लिए भी विभागीय खुफिया तंत्र काम नहीं करता है। 
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पहाड़ के जंगल भालू के लिए है मुफीद
हल्द्वानी। पर्वतीय जिलों के जंगल वन्य जीवों के लिए बेहतरीन वास स्थल हैं। वन्य विशेषज्ञों के मुताबिक पिथौरागढ़ के घने जंगल में फल और पानी की कमी नहीं होती है। इंसानी दखल भी न के बराबर है। वहां के जंगलों में भालू अधिक संख्या में मिलते हैं। इसी का फायदा उठा कर शिकारी उन्हें निशाना बनाते हैं। 

जंगलों में शिकार की घटनाएं बढ़ी हैं, वहां सतर्कता बढ़ाने की जरूरत है। सभी वन्य जीवों का संरक्षण ही वन विभाग का दायित्व है।
डॉ. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक, पश्चिमी वन वृृत्त

हल्द्वानी। पिथौरागढ़ से भालू के पित्त की तस्करी चीन के लिए होती है। दिल्ली के तस्कर पित्त की थैली को अपने ढंग से चीन भेजकर काफी रकम हासिल करते है। इस गिरोह से जुड़े 11 लोगों को पुलिस की तलाश है। 
वन क्षेत्राधिकारी आरएन गौतम ने बताया कि भालू के पित्त की तस्करी के मामले कई बार पकड़े गए हैं। पिथौरागढ़ में 2004 में सबसे बड़ी खेप बरामद की गई थी। उस समय शिकारियों ने 11 भालुओं को मारकर पित्त की थैली निकाल ली थी। दो महीने पहले विशेष जांच दल ने बनभूलपुरा से एक तस्कर को गिरफ्तार कर भालू के पित्त की थैली बरामद की थी। पता चला कि चीन में भालू के पित्त से शक्तिवर्धक दवाइयां बनाई जाती है। इसी कारण मांग के अनुसार तस्कर चीन को आपूर्ति करते रहते हैं। वन विभाग और अन्य संस्थाओं ने पिथौरागढ़ से कीड़ा जड़ी (यारसा गंबू) और कस्तूरी के  तस्करों को गिरफ्तार कर चुकी है। क्षेत्राधिकारी दिनेश चंद्र ढौडियाल ने बताया कि थानाध्यक्ष कमाल हसन इस गिरोह के पीछे करीब 15 दिनों से लगे थे। इसके बाद सफलता मिली है। पूछताछ के दौरान पिथौरागढ़ से लेकर दिल्ली तक के 11 तस्करों के नाम सामने आए हैं। 

ऐसे पकड़ में आए तस्कर
थानाध्यक्ष कमाल हसन को मुखबिरों से कुछ मोबाइल नंबर मिले और बताया गया कि इन नंबरों से जुड़े लोग कस्तूरी की तस्करी करते हैं। थानाध्यक्ष ने दिल्ली का व्यवसायी बनकर संबंधित नंबरों पर बातचीत की और कस्तूरी की मांग की गई। उन्होंने कहा कि कस्तूरी को विदेशों में सप्लाई करना है। फोन पर तस्कर गणेश धर्मसत्तू ने बताया कि कस्तूरी उसके पास नहीं है, लेकिन भालू के पित्त की थैली मिल सकती है। थानाध्यक्ष ने पित्त की थैली का पांच लाख में सौदा कर लिया। इसके बाद तस्करों को हल्द्वानी बुला लिया गया। गणेश ने इस काम में दीपक को साथ लिया और उसे अपनी कार से लेकर हल्द्वानी आया। दीपक का कहना था कि उसे एक खेप के लिए 50 हजार रुपये मिलने वाले थे। 

एक एमए पास दूसरा बीएससी
कम समय में पैसा कमाने के लालच में बन गए दोनों तस्कर
हल्द्वानी। भालू की पित्त की थैली की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार गणेश धर्मसत्तू और दीपक रावत पढ़े लिखे बेरोजगार और अच्छे घरों से ताल्लुक रखते हैं। कम समय में अधिक पैसा कमाने के लालच में दोनों तस्कर बन गए। 
जब दोनों से पूछताछ की गई तो डिग्री सुनकर पुलिस वाले भी दंग रह गए। गणेश ने शिक्षा शास्त्र में एमए किया है। उसके पिता पीएससी में हैं। घर में कोई कमी नहीं फिर भी वह गलत तरीके से धन कमाने में जुट गया। दीपक रावत ने भी बीएसएसी किया है। वह इन दिनों प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था। दीपक का कहना है कि उसके पिता फौज से सेवानिवृत्त हुए हैं। पैसे के लालच में उसने भी अपना कॅरिअर चौपट कर दिया।

पांच से दस साल तक की सजा 
वन क्षेत्राधिकारी का कहना है कि पित्त की तस्करी के मामले में पांच से लेकर दस साल तक सजा का प्रावधान है। तस्करी को रोकने के लिए काफी सख्त कदम उठाए गए हैं। 
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