हाथ से लिखे पुराने रजिस्टरों में दर्ज सुरों की यह विरासत बताती है कि यहां रामचरितमानस की चौपाइयां भी रागों के अनुशासन में सांस लेती हैं। अल्मोड़ा से शुरू हुई यह सुरमयी परंपरा 165 वर्षों से पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान को स्वर दे रही है। कुमाऊं की रामलीला पर शोध करने वाले संगीतज्ञ डॉ. पंकज उप्रेती बताते हैं कि गौरी पूजन के बाद माता गौरी की ओर से सीता को दिया जाने वाला आशीष राग खमाज कल्याण में प्रस्तुत किया जाता है। इसके बोल हैं - ''''मन जाहिं रांचो मिलहि सो बर सहज सुंदर सांवरो, करुणा निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो''''।
इसी तरह दशरथ की ठुमरी राग भैरवी में प्रस्तुत की जाती है। कैकेयी के साथ उनका संवाद इस अंदाज में होता है - ''''हम नहिं बोलें झूठ उलट जा चाहे भरी सारी, पलट जा चाहे जमी सारी''''। वहीं, श्रीराम का माता कौशल्या के साथ संवाद इन शब्दों में सामने आता है—''''क्यों तू रुदन मचावे जननी आंसू थाम-थाम''''।
खमाज राग में ''''केहि कारण आगमन तुम्हारा...''''जैसी चौपाई प्रस्तुत की जाती है। राग गारा और मांड में ''''चलो हटो जाओ जाओ, जी ना बोलो हमसे'''' व ''''पिता जी कैसे व्याकुल हैं हमें माता बता दीजै'''' जैसी संगीतमय प्रस्तुतियां होती हैं। इसी क्रम में राग विहाग और जयजयवंती में ''''प्रिये तुम काहे होत मलीन'''' और ''''देउ पिया मोहे बरदाना'''' जैसे बोल भी गूंजते हैं।
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अल्मोड़ा की गली से निकला राम-राग, पूरे पहाड़ पर छाया
हल्द्वानी। इतिहासकारों के मुताबिक, कुमाऊं में आधुनिक रामलीला की शुरुआत वर्ष 1860 में अल्मोड़ा के बड़ेश्वर मैदान से हुई थी। इसके सूत्रधार काली कुमाऊं के तत्कालीन तहसीलदार पं. देवीदत्त जोशी थे। उन्होंने ब्रज की रामलीला, नौटंकी और पारसी थिएटर की विशेषताओं को मिलाकर पहाड़ी बोली में गेय-नाटक की अनूठी शैली विकसित की। आगे चलकर वर्ष 1880 में नैनीताल में मोतीराम साह, 1890 में बागेश्वर में शिवलाल साह और 1902 में पिथौरागढ़ में गंगाराम पुनेठा ने इस परंपरा की नींव रखी।
1941 में मिला नया रंग :
नृत्य सम्राट उदयशंकर ने वर्ष 1941 में रानीधारा में पहली बार ''''छायाभिनय रामलीला'''' प्रस्तुत की। प्रसिद्ध लेखिका शिवानी के अनुसार, रामलीला की रिहर्सल शुरू होते ही हर मोहल्ला अयोध्या में बदल जाता था और बड़ेश्वर की रामलीला देखने के लिए दूर-दूर के गांवों से परिवार पहुंचते थे।
गायन ही आत्मा : कुमाऊं की रामलीला को ''''पहाड़ का ओपेरा'''' कहा जाता है। ओपेरा ऐसी नाट्य विधा है, जिसमें कहानी को गायन और संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। लोक कलाकार संघ के सचिव बांकेलाल साह के मुताबिक, कुमाऊं की रामलीला की आत्मा उसका गायन है। वर्ष 1890 में पारसी कंपनी के निदेशक मिर्जा नजीर बेग ने उर्दू में ''''मार्का-ए-लंका'''' नामक ओपेरा तैयार किया था। इसका प्रभाव आज भी यहां की धुनों में दिखाई देता है।