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पहाड़ में उग रहा है कं क्रीट का जंगल

Wed, 06 Jul 2016 12:44 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
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हल्द्वानी। सुरक्षा को दरकिनार कर अब प्रदेश के पर्वतीय जिलोें में भी कंक्रीट के जंगल उग रहे हैं। परंपरागत भवन निर्माण शैली को लगभग भुला दिया गया है। शहर को होड़ देते मकानों को बनाने की कोशिश अब आपदा में किसी भी नुकसान को कई हद तक बढ़ाने वाला भी साबित हो रहा है।

पहाड़ की परंपरागत भवन निर्माण शैली की खास पहचान ढालदार छत, मिट्टी और पत्थर की दीवार और  इसमें लकड़ी का उपयोग रही है। राज्य आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र के अधिशासी अधिकारी पीयूष रौतेला के मुताबिक कमरे छोटे होते थे और ये पहाड़ की परिस्थितियों को देखकर बनाये जाते थे।
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मुसीबत यह है कि  अब मकानों से ढालदार छत गायब होती जा रही है। इसकी जगह सीमेंट की मोटी परत वाली छत का प्रचलन बढ़ रहा है। इसके साथ ही सीमेंट और रोड़ी को मिलाकर बनाई जा रही ईंटों का उपयोग इन मकानों में किया जा रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो इस तरह के मकान भूस्खलन के समय अधिक खतरनाक साबित हो रहे हैं। कारण यह भी है कि भारी छत होने के कारण ये मकान दीवार खिसकने से बैठ जाते हैं और इस कारण अंदर रहने वाले व्यक्ति के लिए बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

क्या है समस्या...
- परंपरागत शैली के मकानों में लकड़ी, पत्थर और मिट्टी का खासा उपयोग होता है। स्थानीय स्तर पर खनन के प्रतिबंध के कारण छत के लिए पत्थर की स्लेट जुटाना अब मुश्किल है। इसी तरह जंगल की लकड़ी पर वन विभाग का एकाधिकार है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर  संसाधन जुटाना मुश्किल हो रहा है। वन विभाग के मुताबिक हक हकूक के लिए स्थानीय स्तर पर डीएफओ कार्यालय पर आवेदन कर लकड़ी हासिल की जा सकती है।

सीमेंट से बने मकान ज्यादा असुरक्षित
-भवन बनाने में पर्वतीय जिलों में परंपरागत रूप से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मिट्टी, पत्थर और लकड़ी का उपयोग होता था। समय के साथ ही इस तकनीक को बेहद सटीक बना लिया गया था। खनन पर स्थानीय स्तर पर प्रतिबंध और शहर की जीवन शैली को मान्यता दिये जाने केचलते अब सीमेंट  से बने मकानों को तरजीह दी जा रही है। स्थानीय स्तर पर राजमिस्त्रियों को इस तरह के मकान बनाने की जानकारी नहीं है। ऐसे में भवन अधिक असुरक्षित साबित हो रहे हैं।
-राज्य आपदा प्रबंधन योजना में दर्ज अनुभव

900 साल पुरानी कोटी बनाल शैली भी खतरे में
- उत्तरकाशी सहित प्रदेश के कई पर्वतीय जिलों में लकड़ी के पांच मंजिला भवन तक तैयार किये जाते रहे हैं। इन शैली को कोटी बनाल शैली कहा जाता रहा है। कई भूकंपों को झेलने में भी यह भवन सक्षम साबित हुये हैं। राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र के मुताबिक भवन बनाने के लिए स्थान का चयन, मिट्टी और लकड़ी का चुनाव करने की व्यापक तकनीक थी। अब यह तकनीक गायब होती जा रही है।

सहेजने की भी है कोशिश
-रैथल में कोटी बनाल शैली के एक मकान को सहेजने की कोशिश अब उत्तरकाशी के इस क्षेत्र में सक्रि य ग्र्रीन पीपुल ने शुरू की है। ग्रीन पीपुल के रुपेश राय के मुताबिक इस तरह के पांच मंजिला भवनों को हैरीटेज भवन के रूप में संजोया जा रहा है। आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र भी अब कोटी बनाल शैली के भवन की प्रतिकृति बनाने की तैयारी में है। राज्य आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र भी अब भूकंपरोधी मकान बनाने केलिए राजमिस्त्रियों को प्रशिक्षित कर रहा है।
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भवनों पर क्या कहती है पहाड़ के प्रमुख शहरों की रिपोर्ट
बागेश्वर- 1165 भवनों का सर्वे किया गया। आठ प्रतिशत भवन ग्रेड पांच के नुकसान की सीमा में पाये गए।
नैनीताल- 2865 भवनों का सर्वे किया गया। 14 प्रतिशत भवन ग्रेड पांच के नुकसान की सीमा में पाए गए। 
मसूरी- 3344 भवनों का सर्वे किया गया। अधिकतर भवन 1950 के बाद बने। 30 प्रतिशत भावन पांच मंजिला थे। एक मंजिला भवनों में 16 प्रतिशत भवन अति संवेदनशील माने जा सकते हैं। 
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