जिस बाघिन ने इतने लंबे समय तक वन विभाग को छकाया और गांव वालों की जान सांसत में रखी, वह बाघिन नाखून घिस जाने के कारण शिकार करने में असमर्थ हो गई थी। वन विभाग के अधिकारी मानते हैं कि उसके आदमखोर होने की सबसे बड़ी वजह भी यही थी।
पश्चिमी वृत्त के वन संरक्षक डॉ. पराग मधुकर धकाते ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक बाघिन को तीन गोलियां लगी हैं। इनमें से एक गोली उसके पैर में, एक पेट में और एक सिर में लगी है, जिस कारण उसकी मृत्यु हो गई। धकाते ने साफ किया कि बाघिन के चारों पंजों के नाखूनों में कमी पाई गई है।
लिहाजा वह शिकार करने में असमर्थ थी और इसी कारण वह मैनइटर (आदमखोर) बन गई थी। उसकी उम्र पांच से छह साल आंकी गई है। मैनइटर का वजन 95 किलो और लंबाई 265 सेंटीमीटर थी। डॉ. धकाते ने इस बात की भी पुष्टि की कि बुधवार को चलाए गए ऑपरेशन के दौरान बाघिन को गोली नहीं लगी थी।
हाथी, ड्रोन, हेलीकॉप्टर सब लगा दिए
बाघिन को मारने या पकड़ने के लिए वन विभाग ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। इस बड़े अभियान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अभियान में तराई पश्चिमी वन प्रभाग, तराई पूर्वी और तराई केंद्रीय के साथ ही सीटीआर कर्मियों की लंबी फौज के साथ एक हेलीकॉप्टर, ड्रोन, तीन हाथी, चार शिकारी कुत्ते, 10 मचान, सात पिंजरे, कैमरा ट्रैप और राय सिखों के साथ ही पांच शिकारी लगाए गए थे।
धकाते भी स्वीकारते हैं कि यह अभियान उनके लिए एक बड़ी चुनौती था। उन्होंने कहा कि बेशक हमें ज्यादा दिन लगे, लेकिन इससे एक नया अनुभव भी मिला है। अब ऐसे अभियानों में वन विभाग समय रहते कामयाबी हासिल की जा सकेगी। आदमखोर बाघिन के मरने के बाद फिर ग्रामीण अपनी फसलों को काटने के लिए खेतों में जुट गए हैं।
अभियान दल में ये थे शामिल
बाघिन को ढेर करने वाली टीम में मुख्य वन संरक्षक पश्चिमी वृत्त के डॉ. पराग मधुकर धकाते, पार्क उपनिदेशक अमित वर्मा, डीएफओ कहकशां नसीम, डीएफओ नेहा वर्मा, एसडीओ कलम सिंह विष्ट, जेपी सिंह, जीएस कार्की, लक्ष्मण सिंह विष्ट, शेखर तिवारी व शिकारियों में राजीव फोलोमन, जॉय हुकुल, लखपत सिंह, हरीश धामी आदि थे।