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वैदिक मंत्रोच्चार और विधिविधान से हुआ होलिका दहन

Wed, 23 Mar 2016 09:44 PM IST
ब्यूरो/ हल्द्वानी
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होलिका दहन - फोटो : अमर उजाला
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फाल्गुन माह की पूर्णिमा को आज विधिवत मंत्रोच्चार के बीच होलिका दहन किया गया। होलिका दहन कार्यक्रम में रामलीला कमेटी के सदस्यों समेत शहर के तमाम गणमान्य नागरिकों और महिलाओं ने शिरकत की। होलिका दहन के बाद अग्नि को समर्पित किए गए अन्न की बाली को लोग घरों को ले गए।
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बुधवार को सुबह शुभ मुहूर्त पर 5.17 बजे होली ग्राउंड में होलिका दहन से पूर्व पूजन कार्य संपन्न कराया। यहां होली ग्राउंड और पटेल चौक में होली दहन कार्यक्रम पंडित गोपाल दत्त भट्ट ने संपन्न कराया। इससे पूर्व दोनों स्थलों पर स्थापित होलिका को कंडों की माला से अलंकृत कर रोली, चंदन आदि से पूजा अर्चना की गई।

लोगों ने होलिका पर अपने घरों से लाए गन्ने की पेड़ी और गेहूं की बालियां चढ़ाईं और शेष बचे गेहूं की बालियों  को अपने घरों को ले गए। इस मौके पर लोगों ने आपस में एक दूसरे को होली की बधाई दी और गले मिलकर सभी के सुख समृद्धि और ऐश्वर्य की कामना की। होलिका दहन कार्यक्रम को संपन्न कराने में रामलीला कमेटी के अध्यक्ष लीला कांडपाल, गोविंद बगड्वाल, मनोज चौहान, मनोज गुप्ता, तरुण बंसल, संजय राणा आदि थे।
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होलिका दहन के बाद होता है नवान्न ग्रहण
हल्द्वानी। होली त्यौहार पर होली दहन के दिन गेहूं की बाली होलिका पर चढ़ाकर नया अन्न ग्रहण करने की परंपरा रही है। क्षेत्र के लोग इस दिन होलिका के समक्ष गन्ने की पेड़ी पर तैयार गेहूं की बालियां बांधकर ले जाते हैं। उसका भोग लगाया जाता है और शेष बची बाली को अपने घर ले जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से बाद अनाज तैयार हो रहा है और इसी बाली के साथ नए अन्न की शुरुआत करते हैं। मान्यता है कि इससे अन्न में वृद्धि से साथ ही सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

वैदिक काल में नवान्नेष्टि यज्ञ भी कहा जाता था होलिका दहन
कैलाश  पाठक
हल्द्वानी। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को मनाए जाने वाला होली पर्व दो भागों में विभक्त है। पूर्णिमा को होलिका पूजन और होलिका दहन और फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा को रंग गुलाल आदि से होली की शुरुआत होती है। ज्योतिषियों के मुताबिक पूर्णिमा को शुभ मुहूर्त में सायंकाल होलिका दहन किया जाता है। वैदिक काल में इस यज्ञ को नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता था। यह त्यौहार नई फसल के आने का सूचक है।

होलिका दहन के अवसर पर लकड़ियों या घासफूस का ढेर लगाकर होलिका पूजन किया जाता है। ज्योतिषी डा. गोपाल दत्त त्रिपाठी के मुताबिक इस दिन खेत के अधकच्चे, अधपकी अन्न को यज्ञ में हवन करके प्रसाद लेने का विधान है। होलिका दहन के बाद होलिका भस्म शरीर पर धारण की जाती है। डा. त्रिपाठी के मुताबिक इस पर्व को नव संवत्सर के आगमन और वसंत के आगमन के उपलक्ष्य में किया जाने वाला यज्ञ भी कहा जाता है। इसी दिन मनु का जन्म होने के कारण इसे मन्वादि तिथि भी कहते हैं। प्रमुख रूप से यह त्यौहार प्रह्लाद से संबंधित है। हिण्यकश्यप अपने विष्णु भक्त पुत्र प्रह्लाद को विष्णु का पूजन करने से मना करता है।

प्रह्लाद के नहीं मानने पर पिता ने उसे मारने के कई यत्न किए, पर सफल नहीं हुआ। अंतत: उसने अग्नि में नहीं जलने का वरदान प्राप्त अपनी बहिन होलिका की गोद में बिठाकर मारने का यत्न किया। दैवयोग से प्रह्लाद तो बच गया और होलिका जलकर भस्म हो गई। इसीलिए इस पर्व को भक्त प्रह्लाद की प्रभु भक्ति और असुरों के विनाश के रूप में भी मनाया जाता है। यह भी मान्यता है कि भगवान शंकर ने कामदेव को अपनी क्रोधाग्नि से भस्म किया, तभी इस त्यौहार का प्रचलन हुआ।

होलिका दहन के समय ऊंचे स्वर में मंत्रोच्चार के साथ ही अट्टहास करना चाहिए, जिससे असुरों का नाश हो जाता है। लोक परंपरा के अनुसार नव विवाहिता स्त्री को प्रथम बार ससुराल में होलिका दहन होते नहीं देखना चाहिए।
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