रियो ओलंपिक में रविवार शाम हुई पुरुष मैराथन में बागेश्वर निवासी नितेंद्र सिंह रावत भले पदक से दूर रहे हों, लेकिन ओलंपिक तक पहुंचना ही अपने आप में बड़ी बात है। वह भी तब जबकि देश में खिलाड़ियों के सामने बजट और संसाधनों का टोटा हो। यह कहना है कि नैनीताल निवासी पूर्व ओलंपियन राजेंद्र सिंह रावत का।
रविवार शाम छह बजे से ही कुमाऊं के लोगों की निगाहें रियो ओलंपिक के 42 किलोमीटर की पुरुष मैराथन में हिस्सा लेने वाले बागेश्वर जिले के अणा गांव निवासी नितेंद्र सिंह राणा पर थीं। इस मैराथन में 84वें स्थान पर रहने के बावजूद नितेंद्र ने लोगों के दिलों में जगह बना ली।
मैराथन का परिणाम सामने आने के बाद देर शाम अमर उजाला ने वर्ष 1988 में हुए ओलंपिक खेलों में भारतीय हाकी टीम में बतौर गोल कीपर रहे पूर्व ओलंपियन राजेंद्र सिंह रावत से नितेंद्र के पदक से दूर रहने संबंधी कारणों पर बात की।
एक सवाल के जवाब में पूर्व ओलंपियन रावत ने कहा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित खेल प्रतियोगिताओं के दौरान खिलाड़ी की मनोदशा एक समान नहीं होती। जब वह अपने देश में खेलता है तो उस पर दबाव नहीं होता, लेकिन जब ओलंपिक जैसी प्रतियोगिता में कोई खिलाड़ी हिस्सा लेता है तो वह खासे दबाव में रहता है।
पहला दबाव तो यह कि ऐसी प्रतियोगिताओं में नामीगिरामी खिलाड़ी उसके सामने होते हैं और दूसरा बड़ा दबाव यह कि देश के लोगों को खिलाड़ी से पदक जीतने की आस होती है। मेडल जीतने और अच्छी पोजीशन लाने का दबाव खिलाड़ी को उसका बेस्ट नहीं दिला पाता।
पूर्व ओलंपियन राजेंद्र का कहना है कि नितेंद्र पदक नहीं जीता लेकिन उसका ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करना ही अपने आप में बड़ी बात है। वह कहते हैं कि जहां दुनिया के अन्य देशों में ओलंपिक जैसी प्रतियोगिताओं की तैयारी चार साल पहले से शुरू करा दी जाती है वहीं हमारे यहां ऐसा नहीं होता है।
राजेंद्र का कहना है कि दुनिया के अन्य देशों में एक-एक खिलाड़ी को तैयार करने के लिए कई-कई कोच होते हैं लेकिन हमारे यहां बजट, कोच और संसाधनों का अक्सर टोटा रहता है, जिसके चलते हमारे यहां के खिलाड़ी अपना बेस्ट नहीं दे पाते हैं।