हल्द्वानी। कैल्शियम और विटामिन डी की कमी से आस्टियो आर्थराइटिस के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। हड्डियों की मजबूती के लिए दूध से ज्यादा दही कारगर है। जीवन शैली में बदलाव और संतुलित आहार के साथ ही रोगों को दूर रखा जा सकता है। यह बात शनिवार को यूके-अपकान में देश-विदेश के डॉक्टरों के मंथन में सामने आई।
फिजिशियन एसोसिएशन ऑफ इंडिया की उत्तराखंड शाखा की ओर से आयोजित यूके अपकान में देश-विदेश के डॉक्टर जुटे। केजीएमसी के डॉ. सिद्धार्थ दास ने बताया कि आर्थराइटिस के लिए अत्यधिक शराब का सेवन और धूम्रपान जिम्मेदार है। कमांड अस्पताल के वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ. दर्शन सिंह भाकुनी ने कहा कि जीवन में हर व्यक्ति को पांच का सिद्धांत अपनाना चाहिए। सप्ताह में पांच दिन चलना चाहिए, 50 मिनट चलना चाहिए और 05 किलोमीटर से ज्यादा नहीं चलना चाहिए।
सुबह या शाम को तेज कदमों के भ्रमण से हड्डियां मजबूत रहती हैं। कैल्शियम की जरूरत पूरी करने के लिए तीन सौ मिलीलीटर दही प्रतिदिन खाना चाहिए। डॉ. इरा पांडे ने रिमोटाइड आर्थराइटिस पर चर्चा की। एम्स ऋषिकेश के डॉ. रवि कांत ने डेंगू, मलेरिया, टायफायड समेत अन्य वायरल बुखार संबंधी बीमारियों पर चर्चा की।
इस दौरान डॉ. केसी लोहनी, डॉ. पंकज गुप्ता, डॉ. नीलांबर भट्ट, डॉ. अरुण कपूर, डॉ. त्रिलोचन सिंह, डॉ. परमजीत सिंह, डॉ. सीएस जोशी, डॉ. डीसी पंत, डॉ. रमनदीप आहूजा, डॉ. मनमीत कौर आहूजा, डॉ. गौरव सिंघल, डॉ. एसएस भंडारी, डॉ. एलके जोशी, डॉ. जेएम भटनागर, डॉ. संजय शाह, डॉ. एसआर सक्सेना, डॉ. एएन सक्सेना, डॉ. अकरम खान, डॉ. एसएस शर्मा, डॉ. अमित वर्मा, डॉ. रेश्मा कौशिक आदि थे।
एसटीएच में देना चाहती थीं सेवा
हल्द्वानी। इंग्लैंड में सेवाएं दे रहीं कुमाऊं की डॉ. इरा पांडे एसटीएच में अपनी सेवाएं देना चाहती थीं। सिस्टम ने एक बार फिर अपना रंग दिखाया और डॉ. पांडे को विदेश जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। डॉ. पांडे ने बताया कि ट्रस्ट के समय नियुक्ति के लिए साक्षात्कार देने गई थीं और मात्र 20 हजार रुपये वेतन मांगा था। शर्त सिर्फ एक थी कि रिमोटाइड आर्थराइटिस के मरीजों को देखेंगी मगर ट्रस्ट के पूर्व सचिव ने उनकी शर्त नहीं मानी और कहा कि मेडिसिन में प्रैक्टिस कीजिए। वह आज भी हल्द्वानी आकर अपनी सेवाएं देने को तैयार हैं।
भारत में लोग सभी काम बैठकर करते हैं। जबकि विदेशों में पालथी मारकर नहीं बैठते हैं। भारत में 45 वर्ष की आयु में लोग आर्थराइटिस की चपेट में आने लगते हैं, जबकि विदेश में 60 वर्ष की आयु में लोग आर्थराइटिस की चपेट में आते हैं। विदेशों में लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक हैं। विदेशों में प्रार्थना (पूजा) भी खड़े होकर या बेंच पर बैठकर करते हैं। खाना भी लोग डाइनिंग टेबिल पर बैठकर खाते हैं इसलिए आर्थराइटिस से बचे रहते हैं।
डॉ. दर्शन सिंह भाकुनी, वरिष्ठ परामर्शदाता, कमांड हास्पिटल लखनऊ
रिमोटाइड आर्थराइटिस के लक्षण को शुरुआत में पहचानकर इलाज शुरू किया जाए तो बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। शरीर के दो सो प्रकार के जोड़ों में ये बीमारी हो सकती है। सुबह सोकर उठने के बाद अगर आप टूथब्रश नहीं पकड़ पा रहे हैं या नल खोलने में दिक्कत हो रही है या आपको अपने हाथ सीधा करने में आधे घंटे से अधिक का समय लग रहा है तो रिमोटाइड आर्थराइटिस के लक्षण हैं। विदेशों में जागरूकता ज्यादा है साथ रूमोटलाजिस्ट की संख्या ज्यादा है। जबकि भारत में इनकी संख्या कम है।
डॉ. इरा पांडे रूमाटलाजिस्ट, इंग्लैंड
हृदयाघात पर नई दवा कारगर
हल्द्वानी। वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद जोशी और डॉ. प्रकाश पंत ने बताया कि हृदयाघात के मामले बढ़ रहे हैं और कमजोर हृदय वालों के लिए नई दवा आई है जो बहुत ही कारगर है। कहा कि हृदय अगर तीस प्रतिशत से अधिक पंपिंग करता है या सामान्य हृदय अगर 60 प्रतिशत से अधिक काम कर रहा है तो ऐसे लोगों को उक्त दवा दी जा सकती है। ऐसे मरीजों में दवा के परिणाम काफी अच्छे आ रहे हैं।
देर तक रक्त रखने पर प्लेटलेट्स के बन जाते हैं गुच्छे
हल्द्वानी। अगर आपकी प्लेटलेट्स लगातार कम रहती है तो घबराए नहीं बल्कि डाक्टर से जांच करा लें। प्लेटलेट्स का कम रहना लीवर की बीमारी का संकेत भी हो सकता है। यूके अपकान में केजीएमसी लखनऊ के क्लीनिकल हीमोटोलाजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एके त्रिपाठी ने बताया कि खून का नमूना लेने के बाद आधे घंटे के भीतर जांच हो जानी चाहिए। नमूने को फ्रिज में रखने पर प्लेटलेट्स के गुच्छे बन जाते हैं और मशीन सही तरीके से प्लेटलेट्स काउंट नहीं कर पाती है।
कहा कि सीबीसी की जांच के दौरान अगर एमपीवी 10 से अधिक हो तो खून की जांच मैन्युअल तकनीक से की जाती है। उन्होंने बताया कि पूर्वी देशों में अब एक लाख तक प्लेटलेट्स को सामान्य माना जाता है। जबकि पहले डेढ़ से साढ़े चार लाख तक प्लेटलेट्स को सामान्य माना जाता था। प्लेटलेट्स का जरूरत से ज्यादा कम होना या मानक से अधिक होना ब्लड कैंसर का भी संकेत होता है। कहा कि बोन मैरो से नमूना लेकर जांच करने पर वास्तविक स्थिति का पता चल जाता है।
कहा कि प्लेटलेट्स कम रहने पर भी मगर व्यक्ति स्वस्थ है और उसे कोई बीमारी नहीं है तो घबराने की बात नहीं है। डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि प्लेटलेट्स कम होने पर जांच जरूर करा लेनी चाहिए कई बार ये लीवर की बीमारी में बदल जाती है।
डॉ. त्रिपाठी ने 2011 में अमेरिका से लौटकर केजीएमसी लखनऊ में हीमोटोलाजी विभाग की स्थापना कराई। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ की फैलोशिप ली। उन्होंने शोध किया और विशिष्ट वैज्ञानिक का दर्जा भी हासिल किया। फेलो आफ रायल कालेज आफ फिजीशियन लंदन, ग्लासगो एवं आयरलैंड में मिला।
उन्होंने साइंस एंड टेक्नालाजी कम्यूनिकेशन, रेडियो, टेलीविजन, डाक्यूमेंट्री, पत्र-पत्रिका, स्वास्थ्य कैंप, जागरूकता शिविर आदि के लिए 2016 में राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया। हिंदी संस्थान ने डॉ. त्रिपाठी की एनीमिया कुछ रोचक जानकारी शीर्षक से पुस्तक भी प्रकाशित की है। साथ ही प्लेटलेट्स क्या सच क्या झूठ शीर्षक से उनकी अगली पुस्तक भी प्रकाशन के लिए प्रेस में है।