हल्द्वानी। कांवड़ यात्रा के चलते उत्तरप्रदेश और दिल्ली से उत्तराखंड की ओर आने जाने वाले रास्तों को बंद कर दिया गया है या फिर केवल कुछ ही दिनों के लिए खोला जा रहा है। इससे कारोबार प्रभावित हो रहा है। सबसे ज्यादा परेशानी ट्रांसपोर्टरों को हो रही है। कई दिन तक सामान से लदे ट्रक फंसे होने की वजह से उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सावन के महीने में आयोजित होने वाली कांवड़ यात्रा के चलते यूपी और दिल्ली की ओर से आने जाने वाले हाइवे जाम हो गए हैं। निजी और सवारी वाहनों की आवाजाही तो जारी है लेकिन माल वाहक वाहनों को कई-कई घंटो तक रोका जा रहा है। कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों में खाद्य सामग्री, राशन, कपड़ा, जूते समेत अन्य सामान की आपूर्ति कुमाऊं मंडल के प्रवेश द्वार हल्द्वानी के रास्ते होती है। पर्वतीय क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लकड़ी, खड़िया और फल आदि की सप्लाई तराई क्षेत्रों में की जाती है। दूसरे प्रदेशों से हल्द्वानी तक पहुंचने के सभी रास्तों पर ट्रांसपोर्टरों के ट्रक फंसे हुए हैं। इसकी वजह से थोक और फुटकर विक्रेताओं तक सामान पहुंचने में देरी के साथ-साथ व्यापार की रफ्तार भी धीमी हो रही है।
ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि सप्ताह में केवल दो ही दिन दिल्ली और यूपी के रास्तों पर हल्द्वानी तक आने वाले और यहां से जाने वाले ट्रकों की आवाजाही कराई जा रही है। करीब चार दिन तक ट्रक फंस रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि बिना व्यापार के भी गाड़ियों की किस्त, रखरखाव, स्टाफ का खर्चा मिलाकर करीब एक से दो लाख तक का नुकसान हो रहा है।
सेल्ट टैक्स और गाड़ी खराब होने की चिंता सबसे ज्यादा
ट्रांसपोर्ट व्यापारियों के मुताबिक सामान किसी प्रदेश से सामान लाने या ले जाने के लिए विभागीय नियमों के तहत ई वे बिल तैयार कराना होता है। इसके समाप्त होने की समय सीमा दो दिन की होती है। वैधता समाप्त होने से करीब सात घंटे पहले बिल को रिन्यू कराना पड़ता है। दो-दो दिनों तक गाड़ियों के फंसने की वजह से बिल को बार-बार रिन्यू कराना पड़ रहा है।
इन मार्गों पर रोके जा रहे ट्रक
कांवड़ यात्रा के चलते दूसरे राज्यों से आने-जाने वाली गाड़ियां दिल्ली, लखनऊ, मुरादाबाद, मेरठ समेत अन्य रास्तों पर रुकी हैं। ट्रांसपोर्टरों के मुताबिक ज्यादातर माल सबसे बड़ी मंडी दिल्ली से आता है। वहां के व्यापारी अपना किराया एडवांस ले लेते हैं लेकिन कांवड़ यात्रा के चलते यहां तक गाड़ियां कई घंटे तो कभी एक से दो दिन की देरी से पहुंचती हैं। ऐसी स्थिति में हमें थोक व्यापारी की ओर से भी दबाव झेलना पड़ता है।
--बातचीत--
कोट
अल्मोड़ा और रानीखेत जिलों में राशन से लेकर किराना समेत अन्य सामान को हमारी कंपनी के ट्रकों से भेजा जाता है। सामान्य दिनों में जहां करीब 100 ट्रक प्रतिमाह भेजे जाते हैं, वहीं कांवड़ के चलते यह संख्या केवल 20-25 रह गई है। कुछ ट्रक यूपी और दिल्ली के मार्गों पर फंसे हुए हैं।
चंद्रशेखर पांडे, ट्रांसपोर्टर।
कोट
धारचूला और गंगोलीघाट के रास्तों से पर्वतीय क्षेत्रों में हमारी ट्रांसपोर्ट कंपनी तराई क्षेत्रों से आपूर्ति होने वाले परचून, कपड़ा, जूता समेत अन्य सामानों को पहुंचाती है। आम दिनों में करीब 60-70 गाड़ी सामान निर्यात कर देते हैं, लेकिन कांवड़ के चलते 10-12 गाड़ियां ही जा पा रही हैं।
-अमन भट्ट, ट्रांसपोर्टर।
कोट
उत्तराखंड से तराई क्षेत्रों में चीड़ की लकड़ी का निर्यात सबसे ज्यादा होता है। हमारी कंपनी चीड़, सागौन, पापुलर व अन्य पेड़ों की लकड़ी और खड़िया (सोप स्टोन पाउडर) का हमारी कंपनी निर्यात करती है। हमारी आम दिनों में जाने वाली करीब 70 गाड़ियां घटकर 10 रह गईं हैं। इनमें से भी कुछ कांवड़ यात्रा के चलते फंसी हुई हैं।
प्रदीप सबरवाल, ट्रांसपोर्टर।
कोट
जहां एक तरफ यूपी और दिल्ली की सरकार ने निजी और सवारी वाहनों की आवाजाही के लिए आधा रास्ता खोल रखा है वहीं ट्रांसपोर्ट व्यवस्था बाधित न हो इसके लिए भी कुछ करना चाहिए। ज्यादातर रास्ते चार लेन या आठ लेन हैं। आयात-निर्यात के लिए भारी माल वाहनों को इनसे भी निकाला जाना चाहिए।
- इंद्र कुमार भूटियानी, ट्रांसपोर्टर