भागमभाग की जिंदगी में लोगों की लाइफ स्टाइल और मिजाज की तरह हल्द्वानी का मौसम भी तेजी से बदल गया है। मानसून की बारिश में भी अब पूरी हल्द्वानी तरबतर नहीं होती। खंडित बारिश होने से आधे शहर में पानी भर जाता है तो आधा शहर सूखा रह जाता है।
कुछ पाकेट तो ऐसे बन गए हैं जहां बारिश की बूंद तक नहीं गिरती। पिछले कुछ दिनों से आधे शहर में मूसलाधार बारिश हो रही है, जबकि आधा शहर बारिश की बूंद के लिए तरस रहा है।
ग्लोबल वार्मिंग से पूरी दुनिया के मौसम चक्र में बदलाव आया है।
ग्लेशियर खत्म हो रहे हैं। नदियों का जलस्तर लगातार गिर रहा है। उत्तराखंड इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है। बादल फटने, भूस्खलन और एक ही पाकेट में लगातार मूसलाधार बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं। हल्द्वानी जैसे शहर में लोकल बारिश चक्र भी बदल गया है। हालांकि ग्लोबल वार्मिंग से ज्यादा मानव निर्मित इसकी वजहें बन गई हैं।
हल्द्वानी शहर तेजी से फैल रहा है। खेतीबाड़ी और हरियाली खत्म हो गई है। खेत खलिहानों की जगह अब कंक्रीट के जंगल खड़े हो चुके हैं। मकान बनाते वक्त कच्ची जगह नहीं छोड़ी जाती है।
घरों और व्यावसायिक भवनों में रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं अपनाए जाने से बारिश का पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता है। बारिश का पानी नालियों से होकर बह जाता है। शहर में आबादी के साथ वाहनों का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
वाहनों के धुएं के साथ सड़कें छोटी हो गई हैं। सड़कों को चौड़ा करने के लिए सिंचाई और बरसाती नहरों को कवर किया जा रहा है। अधिकांश नहरें कवर हो चुकी हैं।
प्रकृति के साथ छेड़छाड़ से उसका बैलेंस लड़खड़ाने लगा है। जिसका असर हर मौसम में दिखने लगा है। गर्मियों में हल्द्वानी का तापमान 46.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है, जो आमतौर पर पहले अधिकतम 44 डिग्री से ज्यादा नहीं होता था।
जाड़ों में भी हल्द्वानी में कभी कोहरा नहीं आता था। लेकिन पिछले कुछ सालों से कोहरा छाने के साथ ठंड बढ़ने लगी है। यही हाल बारिश का है। लोकल बारिश अब पूरे शहर में नहीं होती है। बारिश के अलग-अलग पाकेट बन गए हैं।
शीशमहल से ऊपर मूसलाधार बारिश होती है। यह इलाका काठगोदाम से सटा है। कालाढूंगी रोड, तिकोनिया, बरेली रोड मंडी, सुशीला तिवारी, देवलचौड़ में खंडित बारिश होने लगी है। इनमें कुछ इलाकों में मूसलाधार बारिश होती है तो कई इलाकों में बूंद तक नहीं गिरती है।
लोकल बारिश के लिए लोकल फैक्टर ही मायने रखते हैं। बारिश आद्रता पर निर्भर होती है। जिन इलाकों में आद्रता अधिक होती है वहां बारिश ज्यादा होती है। ये वो इलाके होते हैं जहां हरियाली, खेतीबाड़ी, जंगल और पानी की पर्याप्त मात्रा होती है।
- विक्रम सिंह, निदेशक राज्य मौसम विज्ञान विभाग