ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव के कारण पहाड़ों में जनवरी-फरवरी माह में पड़ने वाली हाड़ कंपा देने वाली ठंड अब धीरे धीरे बीते दिनों की बात बनने लगी है। फरवरी माह में चंपावत जिला मुख्यालय में मई जून माह की गर्मी की तरह का एहसास हो रहा है। मौसम चक्र में लगातार आ रहे बदलाव का असर खेत खलिहानों और पर्यावरण पर भी पड़ने लगा है।
आलम यह है कि अप्रैल मई माह में पकने वाले काफल के फल फरवरी माह में ही पकने लगे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पर्याप्त बरसात नहीं होने से जलवायु परिवर्तन के हालात बन रहे हैं। जिसका असर प्रकृति के विभिन्न रूपों में भी दिखाई देने लगा है। मौसम चक्र के बदलाव के असर से पहाड़ भी अछूते नहीं रह सके हैं।
चंपावत जिले के ललुवापानी, धरसों, बिनवालगांव, परेवा, कुल्याल गांव आदि इलाकों में जहां काफल के पेड़ों में समय से पहले ही फल लगने लगे हैं, वहीं अधिकांश स्थानों में काफल के फल पकने भी लगे हैं। जिसको लेकर स्थानीय काश्तकार आश्चर्यचकित हैं। गौरतलब है कि मौसम चक्र में आए बदलाव के कारण गर्मी के मौसम में बरसात और बरसात के मौसम में सूखे की स्थिति से लोगों के सामने दिक्कतें आ रही हैं। बदलते मौसम चक्र का प्रभाव फसलों पर भी पड़ा है तथा उपज की मात्रा आधे से कम रह गई है।
जिला उद्यान अधिकारी एनके आर्या का कहना है कि इन सभी समस्याओं का मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग को माना जा रहा है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह सभी समस्याएं पेड़ों के कटान की वजह से सामने आ रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग से जहां मौसम चक्र बिगड़ रहा है तो दूसरी ओर फसलों की उत्पादन क्षमता पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है।
बुरांश के पेड़ों में भी समय से पहले आने लगे हैं फूल
मौसम चक्र में आए बदलाव के कारण अकेले काफल का उत्पादन ही प्रभावित नहीं हुआ है। बल्कि बुरांश के पेड़ों में भी समय से पहले फूल आने लगे हैं। उद्यान विशेषज्ञ भूपेंद्र प्रकाश जोशी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खेती किसानी और बागवानी तो प्रभावित हो ही रही है, अब जंगलों में उगने वाले फल और फूलों में भी इसका असर पड़ने लगा है।
बारहमासी सड़क में काटे गए हैं हजारों पेड़
पर्यावरणविद कैलाश चंद्र के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के लिए पेड़ों के अंधाधुंध कटान सर्वाधिक जिम्मेदार है। मनुष्य जंगल को काट कर अपने रहने के घर तो बना रहा है, लेकिन काटे गए वृक्षों के स्थान पर नए पेड़ नहीं लगा रहा है। यदि जल्द ही पौधरोपण के लिए सभी लोग जागरूक नहीं हुए तो भविष्य में और भी अधिक डरावनी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। उनका कहना है कि बारहमासी सड़क निर्माण के लिए अब तक दस हजार से अधिक पेड़ों को काट दिया गया है। जिसका असर भावी भविष्य पर पड़ना तय है।