जंगलों में आग की बड़ी वजह बनने वाला पिरूल अब पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। चीड़ की सूखी पत्तियां, जिन्हें हर साल जंगलों में आग फैलने के जोखिम से जोड़कर देखा जाता है, उनसे तीन अलग-अलग उपयोगी औद्योगिक पदार्थ तैयार करने की दिशा में काम हो रहा है। खास बात यह है कि एक ही कच्चे माल से बायोप्लास्टिक के लिए सेल्यूलोज, प्राकृतिक मिठास के लिए हेमीसेल्यूलोज और औद्योगिक रेजिन के लिए लिग्निन प्राप्त करने की योजना है। नैनीताल के स्टार्टअप हिमन्यूट्री बायोसाइंसेज ने इसी संभावना को आधार बनाकर पिरूल के वैज्ञानिक प्रसंस्करण पर काम शुरू किया है।स्टार्टअप की ओर से विकसित की जा रही जैव-पृथक्करण तकनीक का उद्देश्य पिरूल में मौजूद तीन प्रमुख घटकों को अलग करना है। इन घटकों की उपयोगिता अलग-अलग है और यही इस परियोजना को खास बनाती है।
स्टार्टअप को डीपीआईआईटी से भी मान्यता
ऐसे उपयोग में आएंगे तीनों घटक
सेल्यूलोज : पिरूल से प्राप्त सेल्यूलोज का इस्तेमाल बायोप्लास्टिक, पैकेजिंग सामग्री और कपड़ा उद्योग में किया जा सकता है। इससे पेट्रोलियम आधारित पारंपरिक सामग्रियों के विकल्प विकसित करने की संभावनाएं तलाशने में मदद मिल सकती है।
हेमीसेल्यूलोज: हेमीसेल्यूलोज से जाइलिटॉल विकसित करने की संभावना है। जाइलिटॉल एक शर्करा-अल्कोहल है जिसका उपयोग कुछ खाद्य उत्पादों और ओरल केयर उत्पादों में मिठास देने वाले पदार्थ के रूप में किया जाता है।
लिग्निन : लिग्निन औद्योगिक उपयोग की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे रेजिन और अन्य मूल्यवर्धित औद्योगिक सामग्री विकसित करने की संभावनाएं हैं।
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स्टार्टअप का अगला लक्ष्य पिरूल प्रसंस्करण के लिए पायलट प्लांट स्थापित करना है। यहां तकनीक की क्षमता, उत्पादों की गुणवत्ता और उत्पादन लागत का परीक्षण होगा। प्रयोग सफल रहने पर बड़े स्तर पर उद्योग स्थापित करने की संभावनाएं तलाशी जाएंगी। इससे पहाड़ में पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन की नई राह खुल सकती है। - दीपक जोशी