दावाग्नि काबू से बाहर हो रही है। स्थिति यह है कि पिछले साल जून के आखिरी तक राज्य में जितना जंगल दवानल की भेंट चढ़ा था, इस साल अप्रैल में ही उससे दोगुना जंगल जल चुका है।
सूखे जंगल माचिस की तीली की तरह जल रहे हैं। घटना की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2015 में 15 फरवरी से जून के आखिरी तक जितनी घटना और जंगल जला था, उससे ज्यादा जंगल 21 अप्रैल तक ही जल चुका है। पिछले साल 412 घटना में 701 हेक्टेयर जंगल जला था।
लेकिन इस बार पूरे उत्तराखंड में पिछले पूरे सीजन की तुलना में दोगुने से अधिक जंगल जल चुका है। मुख्य वन संरक्षण नोडल अधिकारी दावाग्नि बीपी गुप्ता के मुताबिक प्रदेश में 740 जंगलों में आग लगने की घटनाएं हो चुकी हैं। आग से 1520.38 हेक्टेयर जंगल जल गया है। इसमें गढ़वाल में 448 घटनाओं में 755.93 हेक्टेयर और कुमाऊं में 169 घटनाओं में 348.30 हेक्टेयर जंगल राख हो गया। प्रदेश में वन्य जीव क्षेत्र में 123 घटनाओं में 416.15 हेक्टेयर जंगल जल चुका है।
इसके अलावा नया जंगल तैयार करने के लिए जो पौधरोपण पिछले साल किया गया था, उसमें भी 11 हेक्टेयर क्षेत्रफल को नुकसान पहुंचा है। आग की बढ़ती घटनाओं से वनाधिकारियों के होश उड़े हुए हैं। अभी अप्रैल के आठ दिन और मई, जून का महीना बाकी है। जिसमें तापमान और चरम पर पहुंचेगा। मुख्य वन संरक्षक व नोडल अधिकारी वनाग्नि बीपी गुप्ता कहते हैं कि वनाग्नि नियंत्रण की हर संभव कोशिश की जा रही है।
कुमाऊं में बने 479 क्रू स्टेशन, 5,735 को लगाया ड्यूटी में
नैनीताल। वनों को आग से सुरक्षा के लिए कुमाऊं मंडल में 479 क्रू स्टेशन स्थापित किए गए हैं जिसमें 5,735 अधिकारियों व कर्मियों को ड्यूटी में लगाया गया है। उत्तरी कुमाऊं में 202, दक्षिणी कुमाऊं में 153 तथा पश्चिमी कुमाऊं वृत में 124 क्रू स्टेशन स्थापित किए गए हैं। इसके अलावा 174 वन रेंजर व उप वन रेंजर, 460 वन दरोगा, 1042 वन रक्षक, 119 माली व मोहर्रिर, 311 अन्य कर्मियों, 1301 फायर वाचर, 698 वन श्रमिकों के साथ ही 1630 ग्रामवासियों की भी आग बुझाने में मदद ली जा रही है।
- जंगलों में आग लगने की घटनाएं कम से कम हों इसके लिए वन महकमा हर स्तर पर प्रयास कर रहा आग के साथ ही जन हानि व अन्य दुर्घटनाएं न हो इस पर विभाग का पूरा फोकस है।
- डॉ. राजेंद्र सिंह बिष्ट, सीसीएफ कुमाऊं मंडल।