टीबी रोग नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य विभाग कार्यक्रम चलाता है पर स्थिति यह है कि मेडिकल कालेज के टीबी एंड चेस्ट रोग विभाग में डाक्टरों की कम संख्या रोगियों पर भारी पड़ रही है।
डाक्टरों के कम होने के कारण ओपीडी में लंबी लाइन लगती है। स्थिति यह है कि सुबह आने वाले रोगियों का नंबर शाम तक आ पाता है। डाक्टरों के अनुसार रोगियों की संख्या लगातार बढ़ी है।
सेंटर को विकसित करने, बेडों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव भी भेजा गया था। जो अभी तक फाइलों में है। मेडिकल कालेज के टीबी एवं श्वांस रोग विभाग में अभी तक पीजी की पढ़ाई नहीं शुरू हो सकी है।
पीजी की पढ़ाई के लिए किसी भी विभाग में कम से कम 30 बेड होने चाहिए मगर यहां सिर्फ 15 ही बेड हैं। सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कितनी संजीदा है।
इसका पता इस बात से चलता है कि विभाग के मुखिया 2005 से लगातार विभाग को अपग्रेड करने का प्रस्ताव भेज रहे हैं मगर शासन में प्रस्ताव पहुंचकर धूल फांकता रहता है।
विभाग में एचओडी डा. आरसी नौटियाल के अलावा महज एक एसोसिएट प्रोफेसर डा. डीसी पुनेरा हैं। ओपीडी में एक दिन डा. नौटियाल और एक दिन डा. पुनेरा बैठते हैं।
डा. नौटियाल ने अस्पताल को 60 बेड करने का प्रस्ताव भेजा था। इसमें 15 बेड का आईसीयू भी प्रस्तावित था, मगर शासन स्तर पर इसका संज्ञान तक नहीं लिया गया।
तत्कालीन प्राचार्य डा. आरसी पुरोहित ने भी विभाग के विस्तार तवज्जो नहीं दी। उन्होंने डा. नौटियाल के प्रस्ताव को शासन में आगे बढ़ा दिया।
डा. नौटियाल ने डा. पुरोहित से व्यक्तिगत रूप से शासन स्तर पर पैरवी करने की इजाजत मांगी थी, मगर डा. पुरोहित ने इजाजत नहीं दी।
टीबी एवं श्वांस रोग विभाग में प्रतिदिन लगभग 55 से 70 मरीज आते हैं। 60 मरीज प्रतिदिन आने का औसत है। सुबह से लाइन लगने के बाद भी डाक्टर तक पहुंचने में मरीजों को शाम के पांच बज जाते हैं।