आजादी के बाद स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और लोगों को स्वदेशी के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से शुरू हुआ खादी उद्योग आज आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। लोकल फॉर वोकल की पहली पहल के रूप में गांव-गांव रोजगार का माध्यम बने खादी उद्योग की संस्थाओं का राज्य सरकार पर पिछले दो वर्षों से एक करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान बकाया है।
हर साल दो अक्तूबर को गांधी जयंती से 108 दिनों तक खादी उत्पादों पर ग्राहकों को छूट दी जाती है। इसमें 15 प्रतिशत केंद्र और 10 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करती है। राज्य सरकार की वर्ष 2024-25 और 2025-26 की अनुदान राशि अब तक लंबित है। इसमें देहरादून प्रभाग के करीब 42 लाख, नैनीताल के 28.69 लाख, चनौदा प्रभाग के 21.64 लाख और गोचर के करीब 14 लाख रुपये शामिल हैं।
सिमट रहे उत्पाद और बिक्री केंद्र
कुमाऊं-गढ़वाल में गांधी आश्रम के दो-दो प्रभाग हैं। इन्हें राज्य सरकार 10 फीसदी छूट देती है इसमें छह फीसदी धनराशि के रूप में और चार फीसदी निर्माण सामग्री के रूप में शामिल है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे खादी उद्योग पर कर्मचारियों और आपूर्तिकर्ताओं की करोड़ों की देनदारी है। सरकार की अनदेखी के बीच प्रदेश में खादी के उत्पाद और बिक्री केंद्र भी लगातार सिमट रहे हैं।
दो साल तक खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की बैठक ही नहीं हुई थी। हाल ही में जो बैठक हुई थी उसमें खादी पर मिलने वाली छूट का लाभ केवल उत्तराखंड के लोगों को ही देने का फैसला लिया गया। बकाया भुगतान को लेकर भी जानकारी मांगी गई है जिसका विवरण बोर्ड को भेजा जा रहा है। -भरत सिंह चौधरी, कैबिनेट मंत्री, खादी एवं ग्रामोद्योग