शुक्रवार सुबह शीशमहल स्थित रामलीला मैदान तीन पीढ़ियों की खेल प्रतिभा का गवाह बना। वहां चल रही अखिल भारतीय वालीबाल प्रतियोगिता में गौरव डंगवाल को खेलता देख उसके दादा हरीश चंद्र डंगवाल को अपनी जवानी याद आ गई। सन 1961 से 1978 तक हरीश चंद्र ने भी इस मैदान में इसी टूर्नामेंट के कई मैच खेले, जबकि उनके बेटे और गौरव के पिता विक्रम डंगवाल ने भी इसी मैदान में वालीबाल सीखी और राष्ट्रीय स्तर तक खेले।
भिकियासैण निवासी हरीश चंद्र डंगवाल (78) 1958 में रोडवेज में नौकरी करने काठगोदाम आ गए थे। तभी से वे रामलीला मैदान शीशमहल में वक्त मिलने पर वालीबाल खेला करते थे। धीरे-धीरे इस खेल में हाथ साफ हुआ तो वे कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कुमाऊं का प्रतिनिधित्व करने गए। इसके बाद उनके छोटे बेटे विक्रम डंगवाल ने भी वालीबाल खेलना शुरू किया और इसी मैदान में कई बड़े टूर्नामेंट खेले।
अखिल भारतीय वालीबाल प्रतियोगिता में भी कई साल खेले। हरीशचंद्र के बड़े बेटे दीपक डंगवाल भी इसी मैदान और इसी प्रतियोगिता में खेलकर आज राष्ट्रीय स्तर के वालीबाल कोच हैं। चेन्नई में हुई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में वे रेफरी रहे थे। शुक्रवार को हरीश चंद्र के पोते और सेंट थेरेसा के स्टूडेंट गौरव ने इसी मैदान पर इसी प्रतियोगिता में खेलकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
पोते का मैच देखने के बाद हरीश चंद्र काफी खुश थे। गौरव दो बार नेशनल भी खेल चुका है। हरीश चंद्र को खुशी है कि आज जहां लोग क्रिकेट के लिए पागल हो रहे हैं उनके पोते ने वालीबाल को तरजीह दी है।