कुमाऊं का सबसे बड़ा अस्पताल, लेकिन संवेदनशीलता शून्य। लोग बड़ी उम्मीद लेकर पहाड़ से अपने बच्चों व परिजनों को इलाज के लिए यहां लाते हैं लेकिन सुशीला तिवारी अस्पताल प्रबंधन को इसकी तनिक भी परवाह नहीं।
कृष्णा की मौसी आरती ने बताया कि पांच अक्तूबर को घर के पास खेलते समय वह चोटिल हो गया था। उसके सिर में चोट लगी थी। बच्चे को गरुड़ के निजी अस्पताल लेकर गए थे। वहां से उसे अल्मोड़ा के बेस अस्पताल रेफर किया गया। अल्मोड़ा से हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल के लिए भेज दिया गया। बताया कि पांच अक्तूबर की रात नौ बजे बच्चे को एसटीएच की इमरजेंसी में लेकर पहुंचे। यहां से बच्चे को न्यूरोसर्जरी वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। सीटी स्कैन से ब्रेन हैमरेज का पता चला।
ऑपरेशन से पहले बच्चे ने अपनी मां को बताया कि उसके सिर में दर्द हो रहा है। वहां मौजूद स्टाफ ने बच्चे से बोला कि हाथ-पैर हिलाओ दर्द सही हो जाएगा। इसके कुछ घंटों बाद ही बच्चे ने दम तोड़ दिया।
आरती ने आरोप लगाया कि शनिवार सुबह अस्पताल के स्टाफ ने बताया कि ऑपरेशन किया जाएगा। ऑपरेशन के लिए दिन में करीब 12 बजे कपड़े बदले गए। इसके बाद करीब ढाई बजे तक रुके रहे, लेकिन कोई ऑपरेशन के लिए नहीं पहुंचा। आरोप है कि अस्पताल में भी बच्चे को देखने के लिए सीनियर डॉक्टर नहीं आए। बच्चे की मौसी ने अधिकारियों को मामले में शिकायत करने की बात कही है। वहीं, अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि बच्चे का इलाज सीनियर डॉक्टर की निगरानी में चल रहा था।
परिजनों का आरोप है कि वे बच्चे को ऑपरेशन थियेटर के बाहर 12 बजे लेकर पहुंचे थे। डॉक्टर का इंतजार करते रहे लेकिन वह तीन बजे बाद पहुंचे। ओटी के अंदर तक नहीं ले गए। ऑपरेशन की तैयारी हो गई है कहकर ऑपरेशन थियेटर के बाहर लेकर आए थे।
किसी बच्चे के गंभीर होने की सूचना मिली थी। ऑपरेशन के लिए न्यूरोसर्जन नहीं आए। बच्चे को शुक्रवार रात में ही शिफ्ट करने के लिए कहा गया था। शनिवार सुबह आठ बजे फिर से शिफ्ट करने के लिए एनेस्थीसिया की टीम ने निर्देश दिए थे, लेकिन मरीज को शिफ्ट नहीं किया गया। फिर डेढ़ बजे जब टीम इमरजेंसी ओटी में थी, तब फिर कॉल आई, लेकिन आईसीयू में कोई बच्चा नहीं था। पता चला कि बच्चा ट्रॉमा ओटी में है। वहां बच्चे को ओटी के बाहर किसने शिफ्ट किया, किसी को नहीं पता।- डॉ. गीता भंडारी, विभागाध्यक्ष एनस्थीसिया।
बच्चे को ब्रेन हैमरेज था, मरीज को ऑपरेशन की जरूरत थी। सिर की चोट के मरीजों की एक-दो घंटे में ऑपरेशन पर जान बचाई जा सकती है। शुक्रवार को ही ऑपरेशन की तैयारी कर ली गई थी। सुबह नौ बजे ही ऑपरेशन के लिए रेफरेंस एनेस्थीसिया को भिजवाया। शाम छह बजे एनेस्थीसिया ने देखा, जबकि एक घंटे में ओटी में शिफ्ट हो जाना चाहिए था। एनेस्थीसिया से मरीज को फिर से खून चढ़ाने, बच्चे के डॉक्टर को दिखाने और रिपोर्ट कराने लिए कहा गया, ये कराते हुए सुबह हो गई। शनिवार सुबह एक ओटी के बाद शिफ्ट करने के लिए बताया गया, तब तक बच्चे की मौत हो गई। अधिकारियों को मामले में जानकारी दे दी है। - डॉ. अभिषेक राज, न्यूरो सर्जन।
बच्चे की मौत के मामले में शिकायत मिलने पर जांच कराएंगे। ऑपरेशन में क्यों देरी हुई, किस वजह से सर्जरी नहीं हो सकी, इस मामले में संबंधित विभागाध्यक्षों से रिपोर्ट ली जाएगी।