यूं तो हिंदू धर्म में मरने के बाद तेरहवीं की जाती है, लेकिन कोई जीते-जी अपनी तेरहवीं करवा ले, तेरहवी पर लोगों को खुद ही मेजबान बनाकर भोज कराये और दान दे तो बात कुछ अटपती लगती है। लेकिन रामनगर क्षेत्र में ऐसा वास्तव में हुआ है।
मूलरूप से राजपुर बहजोई संभल (यूपी) और हाल मोतीमहल गांधीघाट निवासी 90 वर्षीय रूपराम ने ऐसा ही कुछ किया, जिसने भी सुना वह हैरान रह गया।
रूपराम ने अपने क्रिया कर्म का इंतजाम भी कर दिया है। इसके लिये उसने पड़ोस में रहने वाली समाजसेविका को कुछ नगदी दे दी है।
रूपराम के अनुसार वह 42 साल से रामनगर में रह रहे हैं। वह शादी समारोह में कारीगरी का काम करते थे। अब उन्होंने अपने कमरे में ही थोड़ा सामान रखकर दुकान का रूप दे दिया है।
20 साल पहले पत्नी का निधन हो चुका है। उनकी दोनों विवाहित पुत्रियां रामनगर में ही रहती हैं। उनकी मौत के बाद बेटियों को कोई परेशानी न हो, इसके लिए उन्होंने खुद तेरहवीं कराने का फैसला लिया है।
रूपराम अपने मकान को इस शर्त पर बेच चुके हैं कि मरने तक वह एक कमरे में रहेंगे। कमरे में ही एक छोटी सी दुकान के सहारे रूपराम अपने दिन काट रहे हैं। अब कहते हैं जो दिन कट जाता है वही अपना है।