रमजान के पाक महीने में 30 रोजों के बाद गुरुवार को ईद जनाब अमीनुर रहमान के परिवार में भी खुशियां लेकर आई। त्योहार पर उनके घर रौनक रही। परिवार ने एक-दूसरे को मुबारकबाद दी। लजीज पकवान बने और पूरे दिन ईद की बधाइयां देने वालों की आवभगत रही।
रामपुर रोड सुशीला तिवारी अस्पताल के पास हरिपुर सूखा कालोनी में रह रहा अमीनुर का परिवार मौजूदा परिवेश में एक खुशहाल परिवार कहा जा सकता है। दोनोें बेटे नसीम और कामरान कामकाजी है, अमीनुर की बेगम आलिया और गृहणियां दशा, शाजिया पढ़ी लिखी हैं। अमीनुर पांचों वक्त की नमाज पढ़ते हैं। उनका कहना है कि ईद यह भी बताती है कि मदद के लिए दिल और मुठ्ठी हमेशा खुली रखनी चाहिये। यहीं संस्कार परिवार के अन्य सदस्यों को दिए हैं। इस परिवार के लिए खुशियां बांटने के लिए ईद से बढ़कर कोई मौका नहीं आता।
अमीनुर का 11 सदस्यों का कुनबा है। ईद की नमाज से पहले उन्होंने 35 रुपये के हिसाब से 385 रुपये फितरा (दान) किया। फितरा का मतलब किसी भी जरूरतमंद को पौने तीन किलो गेहूं या फिर गेहूं की कीमत के बराबर रुपये दान करना होता है। इस साल फितरा की राशि प्रति सदस्य 35 रुपये तय थी। फितरा देने के बाद अमीनुर अपने बेटे एवं पौत्रों के साथ नमाज पढ़ने ईदगाह निकल पड़े। नमाज के बाद दान किया। घर लौटने तक सिवईं, खीर, जर्दा, बिरयानी समेत कई पकवान तैयार थे। अमीनुर के नाती-नातिन शना, गानिम, अयान, अमान, वर्दा के चेहरे पर ईद का उल्लास साफ झलक रहा था।
सुबह 10.30 बजे से ही यह परिवार मेहमान नवाजी में व्यस्त हो गया था । नाते-रिश्तेदारों और दोस्तों का आने का सिलसिला शाम तक चलता रहा। ईद की बधाई के साथ लजीज व्यंजनों की दावत हुई। परिवार का मानना है कि ईद नाते, रिश्तेदार और दोस्तों के मिलने और खुशियां बांटने का त्योहार है। अब शुक्रवार को अमीनुर की बेटियां मायके और बेटे ससुराल जाएंगे, ताकि सब लोग एक दूसरे को ईद की मुबारकबाद दे सकें।
हल्द्वानी। ईद की खुशी में जहां मुसलिम इलाकों में दावतें चल रही थी, वहीं ढोलक बस्ती के मुसलिम परिवार शाम को चूल्हा जलाने की चिंता में थे। ढोलक बस्ती शहर की मलिन बस्ती है। अधिकांश परिवार ढोलक बनाते और फेरी लगाकर बेचते हैं। कुछ परिवार मजदूरी भी करते हैं। अधिकांश परिवारों में रोजाना कुआं खोदकर पानी पीने जैसी स्थिति है। ईद की छुट्टी पर अधिकांश लोग बेरोजगार हो गए। कोई भी नेता और संगठन इस बस्ती के मुसलिम परिवारों में खुशियां बांटने नहीं पहुंचा।
ढोलक बस्ती हल्द्वानी रेलवे स्टेशन से सटी है। बस्ती में करीब एक हजार की आबादी है। करीब 75 फीसदी मुसलिम और 25 फीसदी हिंदू हैं। बस्ती के परिवारों के लिए न होली-दीवाली आती है और न ही ईद। अधिकांश लोग रोजीरोटी कमाने की जद्दोजहद में ही पूरी जिंदगी निकाल देते हैं। बस्ती में नारकीय जीवन है। बरसात में पूरी बस्ती तालाब बन जाती है। बरसात में झोपड़ियों में पानी भरने से अधिकांश परिवार रेलवे परिसर में आकर रात काटते हैं।
बस्ती में बिजली नहीं है। बस्ती से सटी कालोनी के घरों से डेढ़ सौ रुपये महीने में अवैध कनेक्शन लिए हैं। बस्ती के चारों तरफ पेयजल की लाइन घुमाई है, लेकिन सार्वजनिक नल यहां नहीं हैं। झोपड़ियों में पानी के कनेक्शन भी नहीं हैं। हर चौथी-पांचवीं झोपड़ी के आगे एक गड्ढा बना है। गड्ढे में पेयजल लाइन की टोंटी लगी है। गड्ढा भरने पर ही लोग उसका पानी पीते हैं।
ईद पर बस्ती में सुनसानी रही। अधिकांश लोगों के चेहरे पर शाम के चूल्हे जलाने की चिंता दिखी। बस्ती के मुखिया हिमायत अली बताते हैं, बस्ती के लिए कभी कोई त्योहार नहीं आता। जिस दिन भरपेट खाना मिल जाता है उसी दिन त्योहार है। सैय्यद अली और शेर दिल कहते हैं कि ईद पर बारिश नहीं हुई अल्लाह की यही सबसे बड़ी नेमत है। बारिश होने पर बस्ती में कई फीट पानी भर जाता है। अफसर अली बताते हैं, किसी को उनकी जरूरत नहीं है। नेताओं को सिर्फ चुनाव के वक्त याद आती है।