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साहित्य को जनता तक पहुंचाने का कार्य पत्रकारिता का : मिश्रा

Sun, 15 Feb 2015 01:52 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला/हल्द्वानी
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साहित्य अकादमी और उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता’ विषय पर आयोजित दो दिनी राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि पूरी दुनिया में साहित्य को जनता तक सरल रूप में पहुंचाने का काम पत्रकारिता ही करती रही है। उन्होंने कहा कि महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी बोली का विकास हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से ही किया। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान तिलक और गांधी ने प्रतिरोध की पत्रकारिता की, जिससे उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
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रामपुर रोड स्थित एक होटल में शनिवार को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में श्री मिश्र ने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता इतनी मजबूत बना दी थी कि लोग अखबार में लिखी गई खबर को झूठ मानने को तैयार ही नहीं होते थे। उन्होंने कहा कि इसके बाद के दौर में विश्व स्तर पर मीडिया पर विज्ञापनों का दबाव बढ़ता गया और साहित्यिक पत्रकारिता हाशिए पर जाने लगी। हिंदी साहित्य की नामी पत्रिकाएं बंद होने का विरोध किसी ने नहीं किया, साहित्यकारों ने भी नहीं। यही वजह है कि एक-एक कर हिंदी की सभी साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो गईं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया आशा की एक किरण है, लेकिन इसमें साहित्यिक बहस का स्तर कम है। इसे ऊंचा उठाने के लिए वरिष्ठ साहित्यकारों और पत्रकारों को आगे आना चाहिए।

मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुभाष धूलिया ने कहा कि भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद के आने के बाद से मीडिया में अपराध, सेक्स और दुर्घटनाओं की खबरों को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है। इसे साधारण पाठक भी सरलता से समझ लेता है, जबकि साहित्यिक पत्रकारिता को समझने में उसे असुविधा होती है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि संपादकीय और साहित्यिक पृष्ठ पढ़ने वाले 10-12 प्रतिशत पाठक ही समाज का नेतृत्व करते हैं। उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया अब असंतोष और असहमति को अभिव्यक्ति देने का काम कर रहा है, लेकिन इंटरनेट जैसे माध्यम की पहुंच अभी जनसंचार के माध्यमों की तरह नहीं है। इस पर अभी ज्वलंत मुद्दों पर गंभीर बहस भी नहीं हो पा रही है। उल्लेखनीय है कि श्री धूलिया ने शनिवार को ही विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर दो वर्ष पूर्ण किए हैं।
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पत्रकारिता एवं मीडिया अध्ययन विद्या शाखा के निदेशक प्रो. गोविंद सिंह ने हिंदी साहित्य के विभिन्न आयामों की चर्चा की। जानेमाने पत्रकार एवं साहित्यकार मंगलेश डबराल ने कहा कि पत्रकारिता इतिहास का पहला ड्राफ्ट होता है और साहित्यिक रचना अंतिम ड्राफ्ट होता है। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया में हत्या, बाढ़ और झगड़े की खबरें भी मनोरंजन बन गई हैं। हिंदी पत्रकारिता हिंदी साहित्य से ही निकली है। भारतेंदु हरीशचंद्र से लेकर रघुवीर सहाय तक साहित्यकारों ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया।

संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय, साहित्य अकादमी के उप सचिव बिजेन्द्र त्रिपाठी, जनसत्ता के विशेष संवाददाता राकेश तिवारी, पत्रकार दिनेश मानसेरा, विष्णु नागर, ज्योतिष जोशी, भारत भारद्वाज, साहित्यकार लीलाधर जगूड़ी, ध्रुव रौतेला, रविंद्र त्रिपाठी, डा. पल्लव आदि ने विचार रखे। इस दौरान विश्वविद्यालय के निदेशक प्रो. गिरिजा पांडे, प्रो. एचपी शुक्ल, कुलसचिव एलएस रावत, पूर्व उच्चशिक्षा निदेशक प्रो. पीसी बाराकोटी सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी मौजूद थे।
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