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गुरुदेव की कर्मस्थली पर सरकार का करम नहीं

Sat, 07 May 2016 01:21 AM IST
अमरनाथ/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
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हैप्पी टैगोर बर्थडे - फोटो : अमर उजाला
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हल्द्वानी। नैनीताल जिले के रामगढ़ स्थित गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की कर्मस्थली और साहित्यिक हब के रूप में विकसित करने की घोषणाएं समय-समय पर होती रही हैं, मगर उन पर अमल अब तक नहीं हो सका है। रामगढ़ के जिस भवन में उन्होंने गीतांजलि के अंश लिखे। वह भवन रखरखाव के अभाव में धीरे-धीरे वह खंडहर हो गया है। काश! उसे सहेजने और संरक्षित करने का प्रयास किया गया होता तो साहित्य सृजन के अलावा पर्यटन का भी केंद्र बनता और भावी पीढ़ी को प्रेरणा भी मिलती। 
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राष्ट्रगान के रचयिता गुरुदेव का जन्म 7 मई 1861 को जोड़ासाँकू ठाकुरबाड़ी (कोलकाता) में हुआ था। उनके 150वें जयंती-वर्ष में पिछले साल देश-विदेश में उनकी याद में अनेक समारोह आयोजित किए गए। डाक टिकट भी जारी किए गए, लेकिन साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार पाने वाले गुरुदेव की स्मृतियों को रामगढ़ में नहीं सहेजा जा सका।

गीतांजलि भवन के अवशेषों को न तो संरक्षित नहीं किया जा सका और न ही उसे स्मारक का रूप दिया जा सका। हालांकि करीब एक दशक तक उनका देवभूमि से अटूट नाता रहा। रामगढ़ में 1903 से लेकर 1913 तक वह तीन बार आए। उन्होंने शांति निकेतन की स्थापना का सपना देखा था, जो उनकी बिटिया की अकाल मौत की वजह से साकार नहीं हो सका।
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तंत्र की लापरवाही की वजह से टैगोर टॉप से आधा किमी की दूरी पर ‘रवींद्र संग्रहालय’ के नाम पर प्राइमरी स्कूल के भवन की तरह 15 साल पहले दो कमरों का जो ढांचा खड़ा किया गया, वह अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। उसकी छत, चौखट आदि गायब हो चुके हैं, दीवारें जर्जर हो गई हैं। रही-सही कसर गर्मियों में जंगल में लगने वाली आग ने पूरी कर दी है। जीर्ण-शीर्ण भवन पर कालिख जम चुकी है।

डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहते रामगढ़ में टैगोर टॉप पहाड़ी पर विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में संग्रहालय के निर्माण की घोषणा की तथा इसके लिए डीएम को शासन को प्रस्ताव भेजने के निर्देश दिए, लेकिन इसके बावजूद उस घोषणा और संबंधित शासनादेश पर अमल नहीं हो पाया है।

  महादेवी वर्मा सृजन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत बताते हैं कि गुरुदेव ने न सिर्फ  कवि के रूप में स्वयं को प्रमाणित किया, बल्कि साहित्य और कला की हर परिचित विधा में उन्हें महारथ हासिल थी। कवि होने के साथ ही वे एक समर्थ उपन्यासकार, कथाकार, नाटककार, निबंधकार, चित्रकार और संगीतकार थे।

फल पट्टी के रूप में मशहूर रामगढ़ की बेहतरीन आबोहवा के चलते 1903 में विश्वकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर अपनी बेटी हेमंती के स्वास्थ्य लाभ के लिए उत्तराखंड आए थे। यहां की मनोरम प्राकृतिक छटा से आकर्षित होकर टैगोर ने रामगढ़ में बसने का मन बनाया। यहीं पर भूमि खरीदकर एक भवन बनवाया। वहीं पर साहित्य सृजन भी किया। उसका नाम ‘गीतांजलि’ रखा, बाद में यह स्थान ‘टैगोर टॉप’ के नाम से जाने जाना लगा।
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