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स्वाति ने झुग्गी झोपड़ियों में चुनी जिंदगी की राह

Mon, 08 Feb 2016 12:57 AM IST
जय प्रकाश पांडे /अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
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 इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी और पुणे जैसे शहर में ही कॅरिअर नहीं होता। झुग्गी झोपड़ियों से भी जिंदगी की राह निकलती हैं। तभी तो स्वाति इंफोसिस में इंजीनियर की नौकरी छोड़कर खेतों में काम करने वाले मजदूरों के बच्चों को पढ़ा रही हैं।
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 उनकी कक्षा में 40 बच्चे पढ़ते हैं। वह बच्चों की हिंदी, अंग्रेजी और गणित का बेसिक स्तर मजबूत कर रही हैं ताकि वे बड़ी कक्षाओं में आसानी से पास हो सकें। स्वाति इस काम को दो साल से कर रही हैं। इसमें मदद उनके दोस्त कर रहे हैं।

स्वाति ने इलेक्ट्रानिक इंजीनियरिंग में बीटेक किया। पढ़ाई करने के बाद इंफोसिस में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी पुणे में ज्वाइन की।


स्वाति बताती हैं कि नौकरी के दौरान कंप्यूटर पर काम करते हुए उन्हें लगता था कि वह अपनी पढ़ाई का समाज के लिए सही उपयोग नहीं कर पा रही हैं। झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को देखकर उन्हें लगता था कि इन बच्चों को उनकी जरूरत है।
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पुणे में नौकरी करते हुए वह अपने दोस्तों के साथ ऐसे बच्चों को पढ़ाने लगीं। पांच साल नौकरी करने के बाद वह 2014 में पुणे छोड़कर हल्द्वानी चली आईं।

 यहां खेतों में काम करने वाले वाले मजदूरों के पास गईं। उन्होंने मजदूरों को बताया कि वह उनके बच्चों को पढ़ाना चाहती हैं। इसके बाद बच्चे उनके पास पढ़ाई के लिए आने लगे। अभी वह 20 का बैच सुबह और 20 का बैच शाम को पढ़ा रही हैं।

बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्होंने पावर ऑफ नॉलेज एंड एजुकेशन (पोक ) संस्था भी बनाई। स्वाति ने बच्चों के लिए लाइब्रेरी भी बनाई है। वह बच्चों की पढ़ाई का बेसिक स्तर मजबूत करना चाहती हैं। कहती हैं कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले आठवीं के बच्चे को अपना नाम तक लिखना नहीं आता था।

 उन्होंने बच्चों को बताया कि शिक्षा से ही गरीबी दूर हो सकती है। बच्चे उनकी बात को समझने लगे हैं। सूरज, दीक्षा, खुशी, खुशबू और धर्मेंद्र भी दीदी से हर उलझा सवाल पूछते हैं।

बच्चों की पढ़ाई में आने वाला खर्च स्वाति के दोस्त देते हैं। इसके अलावा स्वाति ने सोशल साइट से भी चंदा जुटाया है। स्वाति के इस काम में उनकी मां साधना दत्त भी सहयोग करती हैं। उन्होंने कुपोषित बच्चों के लिए सांझा चूल्हा भी शुरू किया है। इसके तहत वह बच्चों को दूध और केला खिलाती हैं। 
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