छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ रहे सुमित्रानंदन पंत ने 18 साल की उम्र में हिंदी में लिखने का संकल्प लिया था। उसके बाद ज्यादातर काव्य रचनाएं उन्होंने हिंदी में लिखीं। हालांकि घरेलू बोली कुमाऊंनी से भी उनको बेहद लगाव रहा, लेकिन कुमाऊंनी में उन्होंने जो एकमात्र कविता लिखी, वह राज्य वृक्ष बुरुंश यानी बुरांश पर थी।
कुदरती सुंदरता को बेहद खूबसूरती से बयां करने के लिए उन्हें हिंदी साहित्य का ‘विलियम वर्ड्सवर्थ’ कहा जाता है। 20 मई 1900 को जन्मे सुमित्रानंदन पंत की जन्मभूमि कौसानी (अल्मोड़ा) के नैसर्गिक सौंदर्य ने ही उनके भीतर के कवि को बाहर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 28 दिसंबर 1977 को उनका देहावसान हुआ।
प्रकृति के सुकुमार कवि पंत ने अपनी कविता ‘बुरुंश’ में लिखा है- ‘सारे जंगल में त्वे जस क्वे न्हां रे क्वे न्हां, फुलन छै के बुरांश, जंगल जस जलि जांछ । सल्ला छू द्यार छू पयां छू अंयार छू, सबनाक डालन में पुंगनक भार छू, तैमें दिलैकि आग, त्वै में जवानिक फाग’। आशय यह कि - ‘सारे जंगल में तुम्हारे जैसा कोई नहीं है, तू खिलता क्या है जैसे सारा जंगल ही लाल हो जाता है।
चीड़, देवदार, पद्म, अयार भी हैं, लेकिन ये शाखाओं के भार से ही लदे हैं, जबकि तुम्हारे दिल के अंदर आग है, यौवन का रस है।’ उन्होंने अपनी मातृबोली के प्रति श्रद्धा भाव रखने में कोई कोताही नहीं बरती। बता दें कि बुरांश का सुर्ख और आकर्षक फूल न केवल देखने में सुखद लगता है, बल्कि उसका जूस हृदय, उदर, मधुमेह आदि रोगों के लिए औषधि के रूप में काम आता है। रोडोडेंड्रोन (वानस्पतिक नाम) का यह पेड़ पर्यावरण संतुलन में भी सहायक माना जाता है। फिर भी इतने महत्वपूर्ण वृक्ष को बढ़ाने के लिए राज्य सरकार की कोई विशेष योजना नहीं है।
‘पल्लव’ से काव्य जगत में पहचान कायम करने वाले पद्म भूषण से सम्मानित पंत का पहाड़ से कभी मोह नहीं टूटा। जब 18 बरस के थे, तब उनकी पहली कविता ‘पल्लव’ छपी थी। उसी दौरान कौसानी जैसे दुर्गम स्थान से निकलकर अल्मोड़ा और फिर इलाहाबाद पहुंचे और वहीं तय किया कि हिंदी में ही कविता लिखेंगे। उन्होंने लिखा है कि ‘हमें ब्रजभाषा की जीर्ण-शीर्ण चोली नहीं चाहिए, इससे हमारा काम नहीं चलेगा। हमें तो अब नया लिबास, नया कपड़ा चाहिए। ये नया कपड़ा हिंदी में ही मिलेगा।’ जब ब्रजभाषा का बोलबाला था, तब यह कहना बड़ी बात थी। वह महादेवी वर्मा के साथ प्रकृति के बीच साहित्य सृजन के लिए अकसर इलाहाबाद से रामगढ़ आते थे।
महादेवी वर्मा सृजन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत बताते हैं कि वह अविवाहित थे, लेकिन उन्होंने कविता लिखी ‘भावी पत्नी के प्रति’ और एक कविता लिखी ‘आज छोड़ दो गृहकाज’। कवि अपनी ही आत्मकथा लिखता हो, ऐसा नहीं है। उन्होंने शादी नहीं की। इसके बावजूद वह वैवाहिक संबंधों पर लिखते थे। 1940 में उन्होंने कविता लिखी थी ‘भारतमाता’।
इसमें हमारे देश की तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों का चित्रण है। वह सदा नए लिखने वालों को प्रोत्साहित करते थे। सुमित्रानंदन पंत को ‘चिदंबरा’ के लिये 1968 में ज्ञानपीठ पुरस्कार और ‘कला और बूढ़ा चांद’ के लिये 1960 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उनके नाम हाल में डाक टिकट जारी हुआ है। उनकी संपूर्ण रचनाएं हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।