कलाम अगर आज जिंदा होते तो नैनीझील को लेकर सपना पूरा न होने की टीस उनके मन में जरूर होती। नैनी झील का पानी हाथ में लेकर कलाम का विज्ञानियों और बुद्घिजीवियों से शायद वही सवाल होता जो उन्होंने पांच साल पहले नैनीताल के बुद्घिजीवियों और विद्यार्थियों से किया था।
कलाम का सपना था कि नैनी झील का पानी इतना साफ हो जाए कि उसे पिया जा सके और अपना चेहरा उसमें नजर आ सके। हम अब तक भी इस दिशा में कुछ खास नहीं कर पाए हैं। पांच साल बाद भी डॉ. कलाम की चुनौती अपनी जगह कायम है। झील की सेहत कुछ हद तक सुधरी है, लेकिन अब भी खासा काम होना बाकी है।
पांच साल पहले कुविवि के दीक्षांत समारोह से ठीक एक दिन पहले विश्वविद्यालय के हरमिटेज भवन में एक गोष्ठी मेें शामिल हुए डॉ. कलाम ने कहा था कि नैनीताल की झील ही इस शहर की खूबसूरती है। हमें इतनी वैज्ञानिक जागरूकता और क्षमता पैदा करनी चाहिए कि झील के पानी को पी सकें और हाथ में इसका पानी लेकर अपना चेहरा देख सकें।
जब ऐसा हो जाएगा मैं तब ही वैज्ञानिकता का लोहा मानूंगा।कुविवि के उस समय कुलसचिव रहे प्रो. डॉ. केके पांडे के मुताबिक कलाम नैनी झील को लेकर चिंतित थे। पानी अभी पूरी तरह से साफ नहीं है, पर अब झील के वजूद पर ही चिंता जताई जा रही है।
कुछ हद तक सुधरी नैनी झील की सेहत
झील संरक्षण प्रोजेक्ट इंचार्ज प्रो. पीके गुप्ता के मुताबिक जल की गुणवत्ता का स्तर पानी में नाइट्रेट स्तर, फॉस्फेट स्तर और पानी की पारदर्शिता के आधार पर तय होता है। 2003-04 से हो रहे अध्ययन के मुताबिक 2003-04 में नाइट्रेट का स्तर 0.27मिग्रा/ली था, 2010-2011 में 0.55मिग्रा/ली और दिसंबर 2015 में 1.6 मिग्रा/ली रहा है। फॉस्फेट स्तर 2003-04 में 0.97 मिग्रा/ली था, 2010-2011 में 0.37 मिग्रा/ली और दिसंबर 2015 में 0.01 मिग्रा/ली रहा है।
इसी प्रकार पानी की पारदर्शिता 2003-04 में 1.19 मीटर, 2010-2011 में 1.72 मीटर और दिसंबर 2015 में 2.0मीटर रही है। यदि नाइट्रेट के स्तर को छोड़ दें तो अन्य दोनों आधार पर कहा जा सकता है कि नैनी झील के जल की गुणवत्ता स्तर सुधरा है।
नैनी झील के वजूद पर ही संकट
नैनी झील इस गर्मी में अपने अब तक के सबसे निम्न जल स्तर पर पहुंच गई थी। पर्यावरणविद् प्रो. अजय रावत के मुताबिक झील का 50 प्रतिशत जल सुखाताल से होने वाले जल रिसाव से आता था। जो मई-जून तक भी झील को सूखने नहीं देता था, लेकिन अब सूखाताल का पानी पंप आउट कर बरसात में ही नैनीझील में मिला दिया जाता है। इससे नैनी झील का जल स्तर स्वत: गिर जाता है। 1950 के आस-पास नैनीताल में 300 से अधिक प्राकृतिक जल स्रोत हुआ करते थे जो अब 25 के लगभग ही बचे हैं।