सर्व शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों में आधारभूत सुविधाएं जुटाने के नाम पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। भारी भरकम धनराशि खर्च होने के बावजूद यहां एक विद्यालय ऐसा है, जहां आज तक पेयजल कनेक्शन तो दूर पेयजल की लाइन तक नहीं हैं। ऐसे में स्कूली बच्चे आसपास के क्षेत्रों से पानी ढोने को मजबूर हैं। स्कूल में पानी की व्यवस्था न होने के कारण शौचालय भी गंदगी से बजबजा रहे हैं। जिसके चलते छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। मौजूदा व्यवस्था को लेकर अभिभावकों में भारी गुस्सा है।
उल्लेखनीय है कि रामगढ़ ब्लाक के प्राथमिक विद्यालय मुक्तेश्वर (प्रथम) में वर्तमान में 16 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। स्कूल में पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है। अधिकांश बच्चे अपने पीने के लिए या तो घर से पानी लेकर आते हैं या फिर उन्हें आसपास के क्षेत्रों से पानी ढोना पड़ रहा है। ऐसे में भी बच्चों को कभी हैंड पंप का दूषित पानी मिलता है तो कभी वह आसपास के रेस्टोरेंटों से पानी लाना पड़ता है। पानी लाने के लिए भी बच्चों को पांच सौ मीटर की चढ़ाई चढ़नी होती है।
मिड डे मील के लिए भी भोजन माताओं और बच्चों को दूर दराज से पानी लाना पड़ता है। पानी की कमी के कारण स्कूल का शौचालय भी गंदगी से बजबजा रहा है। शौचालय से इस कदर दुर्गंध उठती है कि न तो बच्चे ही वहां जाते हैं और न ही शिक्षक-शिक्षिकाएं। शौच के लिए बच्चों और शिक्षक-शिक्षिकाओं को पास के जंगल में जाना पड़ता है। ऐसे में स्कूली बच्चों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और पानी ढोने के चक्कर में बच्चों की पढ़ाई भी बाधित हो रही है।
स्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाओं ने पेयजल व्यवस्था कराने के लिए विभागीय अधिकारियों से लेकर जल संस्थान के अधिकारियों को पत्राचार किया लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। स्कूल में पेयजल व्यवस्था न होने के कारण अभिभावकों में भी भारी गुस्सा है। अभिभावकों का कहना है कि वह अपने पाल्यों को स्कूल में शिक्षा ग्रहण कराने के लिए भेजते हैं लेकिन वहां उनकी ड्यूटी पानी भरने में लगा दी जाती है।
कोट
रोजाना हमें तीन चार चक्कर पानी लेेने जाना होता है। मैडम भी हमारे साथ पानी लेने जाती हैं। जब हम घर में यह बात बताते हैं तो डांट पड़ती है। घर वाले कहते हैं कि तुम पढ़ने जाते हो या फिर पानी ढोने।
- गीता पांडे कक्षा पांच
जब शौच लगती है तो पास के जंगल में जाना पड़ता है। जंगल में जाने में डर लगती है।
- वैष्णवी सोनाल कक्षा तीन