टैंपो, टैक्सी को लेकर भले ही सरकारी चाबुक चले, लेकिन स्कूल बस के किराए को लेकर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं है। उस पर टैक्स को लेकर भी खूब मेहरबानी है। परिवहन अधिकारी मामले में नियम से हाथ बंधे होने की बात कह रहे हैं।
शिक्षा के चलते स्कूल बस पर टैक्स को लेकर काफी राहत दी गई है। माना जाता है कि स्कूल बस गैर लाभकारी तौर पर काम करती है, ऐसे में उस पर कामर्शियल वाहनों का कोई टैक्स नहीं लिया जाए। मसलन एक 52 सीटर कांट्रेक्ट बस का टैक्स साल भर का करीब 60 हजार होता है, जबकि स्कूल बस से केवल 18 हजार ही लिया जाता है।
बाकी वाहनों का किराया परिवहन विभाग में तय होता है, जबकि स्कूल बस इससे ‘मुक्त’ है। प्रत्येक बच्चे से कितना किराया लेने से लेकर बढ़ोत्तरी करने का अधिकार स्कूल प्रबंधन का होता है। इसमें भी कई बार कथित तौर पर खूब खेल होता है। उप परिवहन आयुक्त एसके सिंह कहते हैं कि स्कूल बस की फिटनेस, परमिट आदि देखने का मुख्य तौर पर काम होता है, किराया तय करने का अधिकार नहीं है। स्कूल बस को मान्यता प्राप्त स्कूल से जुड़े होने की शर्त होती है।