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उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: गिरधारी लाल साहू के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार, याचिका खारिज

Wed, 04 Nov 2026 10:06 PM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल

सार

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी की ओर से अपनी गिरफ्तारी पर रोक लगाने और कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य की ओर से थाना केदार/कैंट, देहरादून में दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग वाली याचिका को सुनवाई के बाद खारिज कर दिया है।
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उत्तराखंड हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी की ओर से दायर अपनी गिरफतारी पर रोक लगाने व उनके खिलाफ थाना केदार/कैंट, जिला देहरादून में कैबिनेट मंत्री उनकी पत्नी रेखा आर्य की ओर से दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के बाद याचिका को खारिज कर दिया है।

न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार गिरधारी लाल साहू ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गिरफतारी पर रोक लगाने व उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग की थी। शिकायतकर्ता रेखा आर्य ने गिरधारी लाल साहू पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी थी कि दोनों पक्षों की शादी 6 जुलाई 2004 को हुई थी और लगभग 22 वर्षों से वे साथ रह रहे हैं, इसलिए यह केवल घरेलू विवाद का मामला है जिसे अब आपराधिक रंग दिया जा रहा है। रेखा आर्य ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि शादी के वक्त उनकी पहली शादी और बच्चों की बात छिपाई गई थी, और बाद में अन्य महिलाओं से अवैध संबंध रखने तथा विरोध करने पर उनके साथ मारपीट, गाली-गलौज व जातिसूचक अपमानजनक टिप्पणियां की गईं।

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इसके अलावा, यह भी आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने फर्जी हस्ताक्षर कर और दस्तावेज तैयार कर उन्हें कंपनी के निदेशक पद से जबरन सेवानिवृत्त दिखा दिया, जबकि उन्होंने कोई इस्तीफा नहीं दिया था। साथ ही, एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का भी जिक्र है जिसमें कथित तौर पर साहू द्वारा उन्हें रास्ते से हटाने की साजिश रचने और इसके लिए पैसे खर्च करने की बात सामने आई थी। राज्य के सरकारी वकील और रेखा आर्य के वकील ने इन गंभीर आरोपों का हवाला देते हुए याचिका का कड़ा विरोध किया और कहा कि याचिकाकर्ता जांच में सहयोग भी नहीं कर रहा है। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद स्पष्ट किया कि इस मामले के आरोप केवल सामान्य वैवाहिक मनमुटाव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें शारीरिक प्रताड़ना, दस्तावेजों की कूट रचना, जातिसूचक अपमान और जान से मारने की साजिश जैसे गंभीर संज्ञेय अपराध प्रथम दृष्टया शामिल हैं।

अदालत ने कहा कि 22 साल का पुराना रिश्ता होने मात्र से बाद में होने वाले अपराधों या क्रूरता की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता और ऑडियो रिकॉर्डिंग व फर्जी दस्तावेजों की सत्यता जांच तथा विचारण का विषय है। सुप्रीम कोर्ट के भजनलाल और निहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर मामलों के सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर अदालत मिनी-ट्रायल नहीं कर सकती, अतः एफआईआर को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। इस आधार पर कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

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