देवभूमि उत्तराखंड के प्रसिद्ध संस्कृति कर्मी व जन गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि कुमाऊंनी व गढ़वाली भाषाएं हिंदी से भी पुरानी हैं। इस बात के प्रमाण कुमाऊं-गढ़वाल के राजाओं के शासन काल के शिलालेखों व ताम्रपत्रों में मिले हैं। उन्होंने कहा कि दोनों ही भाषाओं के संरक्षण व संवर्धन के लिए विशेष प्रयास किये जाने की सख्त जरूरत है। उन्होंने उत्तराखंड की बोलियों व भाषाओं के संरक्षण के लिए लोक भाषा अकादमी बनाने की जरूरत पर बल दिया।
शनिवार को पहाड़ समारोह में नैनीताल पहुंचे नेगी ने कहा कि पूर्ववर्ती सरकार में कुमाऊंनी-गढ़वाली को भाषा का दर्जा दिये जाने की मांग संसद में उठी तब सरकार ने सांसद सीता कांत महापात्रा की एक सदस्यीय कमेटी गठित की। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी दे दी है लेकिन अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं होना चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि गोवा, गोरखा सहित अन्य राज्यों की बोलियों को भाषा का दर्जा मिल गया है लेकिन कुमाऊंनी व गढ़वाली भाषा को भाषा का दर्जा नहीं मिल सका है।
उन्होंने इसके लिए उत्तराखंड के लोगों को ही जिम्मेदार माना। नेगी ने उत्तराखंड के राज्य गीत को लेकर उठाए जा रहे सवालों को निराधार बताया। उन्होंने कहा कि इस गीत में देवभूमि उत्तराखंड के सभी क्षेत्रों के इतिहास, संस्कृति व प्राकृतिक परिवेश का समावेश है।
कुमाऊंनी व गढ़वाली के विवाद से बचने के लिए इसे हिंदी मेें लिखा गया है लेकिन इसमें अधिकांश शब्द कुमाऊंनी व गढ़वाली के ही हैं। नेगी ने कहा कि वर्तमान दौर इंटरनेट का हो चुका है इसलिए एलबम के न बिकने से कंपनियों ने एलबम बनाना ही बंद कर दिया है, जिससे नई पीढ़ी के कलाकारों की प्रतिभा सामने नहीं आ पा रही है।