साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे गए पद्मश्री प्रो. रमेश चंद्र साह (76) का कहना है कि साहित्य मनुष्य के मानसिक, भावनात्मक, इंद्रिक आदि सभी पक्षों को प्रशिक्षित कर उसे परिपक्व बनाता है। साहित्य के अवमूल्यन पर चिंतित श्री साह ने इसे सार्वजनिक दुर्घटना करार दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा के मंदिरों में शिक्षा के साथ सुसंस्कार और साहित्य के प्रति प्रेरणा से ही साहित्य के भविष्य को समृद्धशाली बनाया जा सकता है।
राक हाउस कंपाउंड में छोटे भाई केपी साह के आवास में अमर उजाला से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि उस दौर में पुस्तकालय के अभाव के बावजूद शिक्षकों की प्रेरणा और पिता की ओर से रद्दी में पड़े बहुमूल्य साहित्य को खोजकर उन्हें पढ़ने के लिए देने से उनके अंदर का साहित्यकार जागा। वृंदावन लाल वर्मा, भगवतीशरण वर्मा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज भी वह पुराने साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़कर अपनी रचना और साहित्य को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि आज विभिन्न पत्रिकाएं निक ल रही हैं। जो न ही स्तरीय हैं न पठनीय और न ही संग्रहणीय। पहले साहित्य के प्रति निष्ठा और भक्ति दोनों होती थी। इससे साहित्य समृद्ध होता था। आज के कुछ लेखक अपनी लेखनी को साहित्य की शुरुआत और अंत मानते हैं। पहले लेखों में उत्तेजना, कल्पना, विषय के प्रति गूढ़ भाव होते थे।
पद्मश्री साह ने कहा कि आज किसी विषय पर चयन न हो पाने के कारण लोग हिंदी विषय चुनते हैं। हिंदी के शिक्षक, प्राध्यापक ही हिंदी साहित्य के महत्व को युवा पीढ़ी तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं। इससे शोध के स्तर में भी गिरावट हो रही है। हालांकि इसके बावजूद पुराने साहित्य को पढ़ने वाले लोग साहित्य लिख भी रहे हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी विषय व्यक्ति के किसी एक पक्ष को विकसित करता है, लेकिन साहित्य मानसिक, भावनात्मक व इंद्रिक (इंद्रियो) को प्रशिक्षित करने में सक्षम है। इसके लिए पाठक को किसी साहित्यकार अथवा कवि के शब्दों के पीछे छिपी गहराई को समझना होगा। उन्होंने शिक्षण क्षेत्र से जुड़े लोगों का आह्वान किया है कि वह भारत के समृद्धशाली रहे साहित्य के प्रति युवाओं मे प्रेरणा जागृत कर साहित्य के पूर्व स्वरूप को पुनर्स्थापित कर भविष्य को बेहतर बनाएं। श्री साह अपनी बेटी शंपा साह के साथ नैनीताल आए हैं। दोपहर में वे रानीखेत को रवाना हो गए।
साहित्यकारों का संस्मरण है आवाह्यामि
गोबर गणेश उपन्यास से अपनी साहित्य लेखनी की शुरुआत करने वाले और इसी के उत्तरार्ध विनायक में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाले श्री साह अब उपन्यास, साहित्य, कहानी संग्रह समेत 80 से अधिक पुस्तकें लिख चुके हैं। उनकी नई पुस्तकों में संकलन, मेरी प्रिय कहानियां, नेमित्तिक शामिल हैं। हिंदी साहित्य सम्मेलन में सुमित्रा नंदन पंत, बालकृष्ण राव, केदारनाथ राव, महादेवी समेत 23 कवि मालाओं में 24वीं पुस्तक उनकी है। वर्तमान में वह विद्वत साहित्यकारों के संस्मरण लिख रहे हैं, जिनके सानिध्य में रहने का उन्हें सुअवसर मिला। इसे उन्होंने आवाह्यामि (मैं यज्ञ करता हूं ) नाम दिया है।