एक स्टाल में पिसी नूण (पिसा हुआ नमक)। थोड़ा आगे बढ़ने पर लकड़ी के चूल्हे में पकती गरमागरम मडुवे की रोटी। फिर जड़ी-बूटियों और दन-कालीन, पसमीना का ‘बाजार’। कुछ देर बाद चूनाखान के किसान जयलाल खेत में उगी आठ किलो की भारी-भरकम मूली बिकती है।
पहली बोली मुख्य वन संरक्षक (कुमाऊं) परमजीत सिंह के नाम। दाम 2100 रुपए। न एक कम न एक ज्यादा। किस्म-किस्म की चीजों को एक जगह पर समेटने वाले चूनाखान में संस्कृति और पर्यावरण का ऐसा संगम बार-बार नहीं दिखता।
बेशक यहां बर्ड फेस्टिवल लगा है, लेकिन इस फेस्टिवल के साथ हमारे उत्तराखंड की संस्कृति भी तरोताजा हुई है। देश के तमाम हिस्सों से आए पक्षी विशेषज्ञों में पक्षी दर्शनों के साथ यहां के जीवन को जानने की ललक साफ देखी गई। ईको टूरिज्म सेंटर में 34 स्टाल लगे हैं। इनमें कुमाऊं का हस्तशिल्प भी है तो यहां के विलुप्त होते व्यंजन भी।
मेले में वन मंत्री दिनेश अग्रवाल ने भी खुलकर खरीदारी की। पहाड़ी पिसी नूण के स्टाल से उन्होंने 13 प्रकार के नूण खरीदे। जब अंतिम स्टाल में पहुंचे तो एक छोटी कंडी खरीदने का मूड हुआ, लेकिन दुकानदार ने जब रेट 200 रुपए बताए तो मंत्री जी की जेब में गया हाथ बिना रुपए निकाले बाहर निकल आया।
दुकानदार को नसीहत देने लगे, ‘इसे बनाने में तुम्हारी मेहनत लगी है पर यह इतने रेट की नहीं। दाम बढ़ाने की वजह से ही चायना बाजार हम पर हावी हो रहा है। अगर आप सही रेट रखें तो यह कलाकारी आगे बढ़ेगी और रोजगार भी।’ मडुवा, चावल, मक्के की रोटी और पपीते की चटनी के स्टाल पर भी मंत्री गए।