एशियन गेम्स में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्वर्णिम सफलता ने देशभर की बेटियों के लिए नई उम्मीद जगाई है लेकिन नैनीताल जिले की क्रिकेट पिच पर बेटियों की भागीदारी का रनरेट अब भी धीमा है। जिले में क्रिकेट खेलने वाले करीब एक हजार बालकों के मुकाबले बालिका खिलाड़ियों की संख्या सौ के आसपास है। यानी क्रिकेट की क्रीज पर बेटियों की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी ही है।
संख्या बढ़ी लेकिन लड़कों से कम
सुविधाओं का अभाव
ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में क्रिकेट की बेहतर सुविधाएं और नियमित प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं होने से वहां की बालिका प्रतिभाओं को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। कई क्षेत्रों में क्रिकेट मैदान और अकादमी की सुविधा नहीं होने से खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के लिए दूर जाना पड़ता है। महिला कोच की कमी भी बालिका खिलाड़ियों के सामने बड़ी समस्या है। खिलाड़ियों का कहना है कि परिवार का सहयोग, सुरक्षित और सुलभ प्रशिक्षण व्यवस्था तथा प्रतियोगिताओं में पर्याप्त अवसर मिलने से अधिक बेटियां क्रिकेट की क्रीज तक पहुंच सकती हैं।
जिला लीग नहीं, सीधे राज्य स्तरीय ट्रायल
क्रिकेटर बोलीं
मैं सात साल से क्रिकेट खेल रही हूं। पहले के मुकाबले लड़कियों की संख्या बढ़ी है लेकिन अभ्यास और सुविधाएं अब भी कम हैं। ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों से लड़कियों का क्रिकेट खेलने के लिए घर से निकलना आसान नहीं होता। इस खेल में सरकारी नौकरी के अवसर भी सीमित हैं। - ज्योति गिरी, क्रिकेटर, रेलवे
महिला क्रिकेटरों को परिवार का उतना सहयोग नहीं मिलता। उनके लिए मौके और मंच भी सीमित हैं। महिला कोच की सुविधा भी नहीं है। मैं पिछले छह साल से क्रिकेट सीख रही हूं। पहले के मुकाबले बदलाव आया है लेकिन अभी और अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है। - वैशाली टुलेरा, अंडर-19 उत्तराखंड क्रिकेट टीम
गौलापार स्टेडियम के क्रिकेट मैदान को जिला क्रिकेट एसोसिएशन को पीपीपी मोड पर दिए जाने के संबंध में मुख्यमंत्री से वार्ता की गई थी लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। जिले में बालिका क्रिकेटरों की संख्या कम होना चिंताजनक है। एसोसिएशन की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं। - सुमित हृदयेश, अध्यक्ष, जिला नैनीताल क्रिकेट एसोसिएशन