हल्द्वानी। मेडिकल कॉलेज के जनरल सर्जरी विभाग की ओर से लेक्चर थिएटर में सेमिनार का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य न्यूनतम आक्रामक प्रॉक्टोलॉजी विषय पर जानकारी प्रदान करना था। कार्यक्रम में जनरल सर्जरी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्वेताभ प्रधान ने न्यूनतम आक्रामक प्रॉक्टोलॉजी के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह एक ऐसी आधुनिक शल्य तकनीक है जिसमें पारंपरिक ओपन सर्जरी की तुलना में छोटे चीरों व बिना चीरा लगाए गुदा, मलाशय आदि से संबंधित विभिन्न बीमारियों का उपचार किया जाता है।
डॉ. प्रधान ने बताया कि इस तकनीक में लेजर, स्टेपलर और विशेष उपकरणों का उपयोग किया जाता है इसमें मरीज को पीड़ा भी कम होती है। साथ ही रोगी की रिकवरी की अवधि भी काफी कम हो जाती है।
न्यूनतम आक्रामक प्रॉक्टोलॉजी की विभिन्न तकनीकों जैसे एंडोस्कोपिक आदि के बारे में जानकारी साझा करते हुए उन्होंने बताया कि लेज़र विधि से मात्र 2–3 मिमी. के छोटे चीरे के माध्यम से बवासीर, भगंदर, पाइलोनिडल साइनस, फिशर आदि का प्रभावी उपचार संभव है।
राजकीय मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी के प्राचार्य डाॅ. जीएस तितियाल ने जनरल सर्जरी विभाग की इस पहल की सराहना। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम का सीधा लाभ मरीजों के उपचार की गुणवत्ता में सुधार के रूप में देखने को मिलेगा। सेमिनार में डाॅ. पंकज वर्मा, डाॅ. परमजीत सिंह, डाॅ. प्रभात पंत, डाॅ. उत्कर्ष, डाॅ. कुणाल सहित पीजी व एमबीबीएस के छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्ण सहभागिता दर्ज की।
बवासीर के उपचार के लिए स्टेपलिंग डिवाइस का उपयोग
डॉ. प्रधान ने बताया कि ट्रांसएनल मिनिमली इनवेसिव सर्जरी (टीएएमआईएस) में गुदा मार्ग से विशेष उपकरणों की सहायता से ट्यूमर हटाए जाते हैं या फिस्टुला की मरम्मत की जाती है। वहीं स्टेपलर हेमरॉइडेक्टॉमी तकनीक में बवासीर के उपचार के लिए स्टेपलिंग डिवाइस का उपयोग किया जाता है जिससे प्रक्रिया अधिक सुरक्षित व प्रभावी बनती है। ऑपरेशन के तुरंत बाद भी मरीज को बैठने में समस्या नहीं आती है।