नैनीताल। 26 नवंबर को मनाया जाने वाला संविधान दिवस हमें संविधान के सिद्धांत-मूल्यों समानता, स्वतंत्रता, न्याय, मर्यादा और सांविधानिक शासन के साथ ही यह भी याद दिलाता है कि ये मूल्य व्यवहार में कैसे सुनिश्चित हों। ब्रिटिशकाल में वर्ष 1861 से चले आ रहे आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) में जहां दंड पर जोर था
हाल के बदलाव के बाद बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) से न्याय की भावना फलीभूत हो रही रही है।
इस अवसर पर उत्तराखंड हाईकोर्ट के हाल के निर्णयों का विश्लेषण बताता है कि न्यायपालिका ने भी सक्रिय होकर सांविधानिक आदर्शों को धरातल पर उतारने के लिए गंभीर कदम उठाए हैं।
हाईकोर्ट ने कैदियों की रिहाई में देरी पर सांविधानिक मर्यादा और अधिकारों के अनुपालन के लिए राज्य सरकार को समीक्षा बोर्ड बनाने का निर्देश देकर पहले से रिहाई के पात्र कैदियों के मानवाधिकारों पर संवेदनशीलता का उदाहरण दिया जिससे संविधान की धारा 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन की गरिमा का सिद्धांत पुष्ट हुआ और सांविधानिक प्रक्रिया को बल मिला। इस निर्णय ने संदेश दिया कि सांविधानिक अधिकार सिर्फ अमूर्त नहीं बल्कि अमल-योग्य व प्रभावी होने चाहिए।
एक अन्य निर्णय में कोर्ट ने संविधान की भावना के अनुरूप न्याय का समावेशी दृष्टिकोण दर्शाते हुए कॉपीराइट से संबंधित नॉन कंपाउंडेबल मामले को कंपाउंड करने का निर्देश देते हुए एफआईआर खारिज कर दी। कोर्ट ने यहां भी आर्टिकल की धारा 226 का हवाला देते हुए कहा कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए ऐसे अभियोजन को रोका जा सकता है।
इस निर्णय से स्पष्ट हुआ कि अब संविधान की भावना बदले स्वरूप में परिभाषित हो रही है। संविधान की भावना आईपीसी यानी भारतीय दंड संहिता नहीं रही जहां दंड देने पर ही जोर हो बल्कि यह बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) बन चुकी है जहां वास्तविक न्याय करने पर जोर है।
प्रशासनिक व सरकार के अनुत्तरदायित्त्व पर भी सरकार ने सख्ती दिखाई। क्षेत्र में चिकित्सकीय सुविधाओं की कमी पर विधिक सेवा प्राधिकरण के प्रत्यावेदन पर कोर्ट ने चिकित्सा सुविधाओं के सुधार के लिए सख्त निर्देश दिए।
इससे स्पष्ट हुआ कि सांविधानिक शासन का अर्थ सिर्फ कानून का निर्माण नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही भी है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य को अपने सांविधानिक दायित्व निभाने होंगे अन्यथा कोर्ट हस्तक्षेप करेगा। संविधान दिवस की दृष्टि से ये निर्णय पुष्ट करते हैं कि समानता, स्वतंत्रता व न्याय के सांविधानिक मूल्यों का असर सिर्फ सक्षम वर्ग के नहीं बल्कि आम नागरिक के जीवन में महसूस होना चाहिए।
ऐसे निर्णय दिखाते हैं कि न्यायपालिका सिर्फ विवाद निपटाती नहीं बल्कि संविधान की भावना के अनुरूप सुधार की दृष्टि भी रखती है। संविधान दिवस के अवसर पर हाईकोर्ट के ये निर्णय सकारात्मक संकेत हैं कि सांविधानिक शासन न सिर्फ व्यवहार में उतर रहा है बल्कि इन निर्णयों ने इन प्रमुख प्रश्नों को भी सामने रखा कि क्या सांविधानिक अधिकार आम नागरिक तक समय पर पहुंच रहे हैं। संवाद