प्रो. रावत के अनुसार उस वक्त पर नैनीताल एक विशिष्ट प्रशासनिक इकाई के रूप में स्थापित हो चुका था। यहां कार्यरत कर्मचारियों में बंगाली समुदाय के लोगों की अधिकता थी। इस कारण भी सुभाष चंद्र बोस को भवाली लाया जाना सुरक्षित माना गया। उनके अनुसार पहली बार वह यहां छद्म वेश धारण कर पहुंचे थे। इतिहासकार व कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अनिल जोशी का मानना है कि सुभाष के रंगून (अब यंगून) की इंसिन जेल से रिहा होने के बाद 1927 की गर्मियों में बर्मा (अब म्यांमार) में सुभाष चंद्र बोस के चिकित्सक भाई शरत चंद्र बोस को उन्हें टीबी होने का संदेह हुआ और उन्होंने सुभाष को इलाज की सलाह दी। (संवाद)
पहले स्विट्जरलैंड में इलाज कराना चाहते थे सुभाष
सुभाष चंद्र बोस स्विट्जरलैंड में टीबी इलाज कराना चाहते थे, लेकिन वहां से उनके जर्मनी चले जाने की संभावना को देखते हुए उन्हें इसकी स्वीकृति नहीं मिल पाई। तब उन्होंने इलाज के लिए कुमाऊं का रुख किया, जहां गेठिया और भवाली में विशिष्ट जलवायु के कारण टीबी सेनेटोरियम स्थापित किए गए थे जिनकी बहुत अधिक प्रसिद्धि थी।
आजाद हिंद फौज में शामिल हो गईं थी गढ़वाल रेजिमेंट की दो बटालियनें
यहां यह तथ्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि गढ़वाल रेजिमेंट की दो बटालियन बाद में आजाद हिंद फौज में शामिल हो गईं थीं और हिंद फौज में जनरल रहे मोहन सिंह सहित वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के पेशावर विद्रोह और सुभाष की रणनीति के समर्थक रहे तमाम लोगों का उनसे संपर्क इसी दौरान हुआ था। गढ़वाल रेजिमेंट की बटालियन के आजाद हिंद फौज में शामिल होने की पृष्ठभूमि भी उनके इलाज के दौरान ही बनी।