कुविवि के हर्मिटेज भवन सभागार में वैश्वीकरण हिंदी भाषा एवं साहित्य विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे और समापन दिवस पर भी विषय विशेषज्ञों ने हिंदी भाषा व साहित्य की शुरूआत और इसके विकास एवं बेहतर भविष्य को लेकर चर्चा की। इस दौरान शोधार्थियों की ओर से 60 शोध पत्र भी प्रस्तुत किए गए। यह आयोजन डीएसबी परिसर के हिंदी विभाग और महादेवी वर्मा सृजनपीठ उमागढ़ (रामगढ़) की संयुक्त पहल पर हो रहा है।
राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात कवि लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि वैश्वीकरण वर्तमान समय की आवश्यकता है, लेकिन व्यापार के साथ-साथ सांस्कृतिक वैश्वीकरण भी होना चाहिए। प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही ने कहा कि वैश्वीकरण को केवल बाजार और व्यापार से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। दो दिनी राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक प्रो.मानवेंद्र पाठक ने सभी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने शोधार्थियों का आह्वान किया कि राष्ट्रीय संगोष्ठी से मिले ज्ञान से सीख लें, ताकि हिंदी भाषा और साहित्य का भविष्य और बेहतर हो सके।
इस दौरान कुलसचिव प्रो.डीसी पांडे, प्रो.निर्मला ढैला, डा.शशि पांडे, हरिसुमन बिष्ट, प्रो.बीआर कौशल, प्रो.गंगा बिष्ट, प्रो.डीएस बिष्ट, प्रो.बीएल साह, डा.दिव्या उपाध्याय, डा.रितेश साह, प्रो.नीता बोरा, प्रो.राजेश्वरी पंत, डा.सावित्री कैड़ा, डा.गिरीश रंजन तिवारी, प्रो.नीरजा टंडन, प्रो.डीएस पोखरिया, प्रो.निर्मला ढैला, डा.शिरीष मौर्य आदि थे। संचालन प्रो.चद्रकला रावत ने किया।
इन्होंने पढ़े शोध पत्र
दो दिनी राष्ट्रीय संगोष्ठी में राजेश प्रसाद, डा.शुभा मटियानी, माया गोला, ललित मोहन, प्रीति आर्या, अनिल कार्की, लक्ष्मी धस्माना, सीमा अरोरा, एनपी सिंह, उमेश ध्यानी समेत 60 शोधार्थियों ने शोध पत्र पढ़े।
शोध का गिरता स्तर चिंता का विषय : जगूड़ी
प्रख्यात कवि लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि शोध का लगातार गिरता स्तर चिंतनीय है। इसमें सुधार की आवश्यकता है। शोधार्थियों को कर्तव्यनिष्ठा के साथ अपने-अपने स्तर से इसके सुधार की पहल करनी होगी। हर्मिटेज भवन में हुई वार्ता में उन्होंने कहा कि आजादी के 65 साल बाद भी संपर्क भाषा का विकसित नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। कवि जगूड़ी ने कहा कि आज प्रदेश की भाषा के मानकीकरण की बात हो रही है, लेकिन अभिभावक अपने बच्चों को न ही क्षेत्रीय भाषा सिखाते हैं और न ही उन्हें यह भाषा बोलने के लिए प्रेरित करते हैं। ऐसे में मानकीकरण की बात बेमानी है।