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30 से अधिक फिल्म व सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ मना नानू दा स्मृति फिल्म फेस्टिवल

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नैनीताल स्थित कुविवि के हर्मिटेज सभागार में सिने अभिनेता स्व. निर्मल पांडे की याद में आयोजित फिल - फोटो : NAINITAL
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नैनीताल। निर्मल स्मृति न्यास की पहल पर बुधवार को सिने अभिनेता नानू की जन्मभूमि में निर्मल पांडे स्मृति फिल्म फेस्टिवल का आयोजन हुआ। देश के प्रसिद्ध रंगकर्मी, फिल्म निर्माता, निर्देशक, साहित्यकार और संगीत के जानकारों की मौजूदगी में 30 फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। शाम को हुई संगीत संध्या में कलाकारों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश कर आयोजन को यादगार बना दिया।
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मुख्य अतिथि आशित चटर्जी ने कहा कि निर्मल पांडे ने आजीवन वास्तविक रंगकर्मी को जिया है। बड़े पर्दे की फिल्म नाम व शोहरत के बावजूद रंगकर्म की मूल जड़ को नहीं छोड़ा। वह वापस आकर नाट्य विधा को और बेहतर बनाने व युवाओं को मंच देना चाहते थे। टीवी कलाकार रोहिताश्व गौड़ ने एनएसडी से लेकर मुंबई तक के सफर में निर्मल के साथ बिताए पलों को याद किया।
कुविवि हर्मिटेज भवन स्थित देवदार सभागार में कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि आशित चटर्जी, विशिष्ट अतिथि रोहिताश्व गौड़, डॉ कुमार विमलेंदु, मिथिलेथ पांडेय, निर्मल पांडेय स्मृति न्यास संस्थापक अनिल दुबे और रंगकर्मी जहूर आलम ने दीप जलाकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस दौरान राष्ट्रीय अवार्ड विजेता मध्य प्रदेश मूल के योगेंद्र योगी की ओर से बनाए गए निर्मल के तैलीय चित्र का अनावरण कर सभी ने श्रद्धा सुमन अर्पित किए। निर्णायक मंडल सदस्य आरिफ शहडोली, शोभा अक्षर, रोहित हितेश्वर अशोक मेहरा, ओम प्रकाश सिंह आदि रहे। इस मौके पर प्रभात साह गंगोला, आशा शर्मा, हरीश राणा, राजेश आर्या, चारू तिवारी, पवन कुमार, संतोक बिष्ट, अदि ति खुराना, अमित साह, नीरज डालाकोटी, सुनील कुमार, किशन लाल, मो.जावेद मौजूद रहे। संचालन हेमंत बिष्ट और उमेश तिवारी विश्वास ने किया।
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इनसेट
..अब सबका आना तुम्हारा आना लगता है
निर्मल के बारे में निजी संस्मरण सुनाने के दौरान लोगों की आंखें छलक आईं।
इस दौरान निर्मल के सपने के अनुरूप रंगकर्म को बनाए रखने निजी स्तर पर प्रयास करने का संकल्प लिया गया।
साहित्यकार डॉ. कुमार विमलेंदु ने कहा कि इतना असर था तुम्हारे जाने में अब सबका आना तुम्हारा आना लगता है..। डॉ. विमलेंदु ने कहा कि भारतीय सिनेमा का इतिहास वैश्विक सिनेमा के समकक्ष होना हमारे लिए गौरव है। 1898 में लु
मियर बंधुओं ने फ्रांस में इसकी शुुरूआत हुई। भारत में 15 वर्ष बाद 1913 में दादा साहब फाल्के की ओर से राजा हरीश चंद्र फिल्म बनाई गई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रतिकूल असर फिल्म उद्योग पर भी पड़ा जो लंबे समय तक रहा।
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